आगरालीक्स…आगरा में लगा राष्ट्रीय पुस्तक मेला. ‘बुके नहीं, बुक दीजिए’ की परंपरा के तहत अतिथियों को भेंट की गई संविधान की प्रति. नई पीढ़ी को बताया—इंटरनेट और एआई के दौर में भी पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं
इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कितनी भी तेजी से विकसित हो जाएं, लेकिन पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं हो सकता। तकनीक पुस्तकों की जगह नहीं लेगी, बल्कि ज्ञान अर्जित करने में सहायक की भूमिका निभाएगी। नई पीढ़ी को पाठ्यक्रम की किताबों तक सीमित रहने के बजाय प्रतिदिन कम से कम 15 पन्ने किसी अच्छी पुस्तक के जरूर पढ़ने चाहिए। ये बातें आगरा कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल डॉ. पी. बी. झा ने शनिवार को सप्रू हॉस्टल परिसर, आगरा कॉलेज में आयोजित दस दिवसीय राष्ट्रीय पुस्तक मेले के उद्घाटन समारोह में कही। यह मेला 5 से 14 सितंबर तक चलेगा।

समय इंडिया (ट्रस्ट), नई दिल्ली और पुस्तक मेला समिति (रजि.), नई दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले का उद्घाटन डॉ. पी. बी. झा ने किया। इस अवसर पर आगरा कॉलेज के डॉ. वी. के. सिंह, डॉ. ए. के. सिंह और डॉ. बी. के. चिकारा, समाजसेवी एवं लेखिका भावना वरदान शर्मा तथा अनुपमा दीक्षित सहित साहित्य और शिक्षा जगत से जुड़े लोग उपस्थित रहे। समारोह में समय इंडिया (ट्रस्ट), नई दिल्ली के प्रबंध न्यासी चंद्र भूषण ने अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया। वहीं साहित्य सरोवर के संचालक कशिश गोयल ने फूलों के बुके के स्थान पर पुस्तक देने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘बुके नहीं, बुक दीजिए’ संदेश के साथ अतिथियों को भारतीय संविधान की प्रति भेंट की। कार्यक्रम का संचालन कवयित्री डॉ. मनीषा गिरि ने किया।
‘हर दिन 15 पन्ने पढ़िए, सोचने की ताकत बढ़ाइए’
मुख्य अतिथि डॉ. झा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि पुस्तकें केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि मनुष्य में विचार, विवेक, तर्क और कल्पनाशीलता विकसित करती हैं। इंटरनेट और एआई सूचना को तेजी से उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन गहराई से पढ़ने, समझने और चिंतन करने की संस्कृति पुस्तकों से ही मजबूत होती है। उन्होंने छात्र-छात्राओं से कहा कि वे प्रतिदिन अपने पाठ्यक्रम से अलग किसी साहित्यिक, वैचारिक अथवा ज्ञानवर्धक पुस्तक के कम से कम 15 पन्ने पढ़ने की आदत डालें।
डंडे-बंदूक के साथ संविधान की किताब भी हो : चंद्र भूषण
प्रबंध न्यासी चंद्र भूषण ने कहा कि यह धारणा गलत साबित हो रही है कि डिजिटल युग में किताबें नहीं पढ़ी जा रहीं। उन्होंने कहा कि समय इंडिया अब तक 15 राज्यों में 555 पुस्तक मेलों का आयोजन कर चुका है और अनुभव उत्साहजनक रहे हैं। आज भी पाठक अच्छी और उपयोगी पुस्तकों की तलाश में हैं, जरूरत उन्हें किताबों तक पहुंचाने की है। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र और बेहतर होगा, यदि हर पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी के हाथ में डंडे और बंदूक के साथ संविधान और अच्छी पुस्तक भी हो। हथियार व्यवस्था की रक्षा कर सकता है, लेकिन संविधान और पुस्तकें लोकतांत्रिक चेतना की रक्षा करती हैं।” उन्होंने सामाजिक, शैक्षणिक और सरकारी समारोहों में फूलों के बुके के बजाय पुस्तक भेंट करने की संस्कृति विकसित करने की अपील की।
राष्ट्रीय पुस्तक मेले में रविवार, 6 सितंबर को शाम 4:30 बजे सभी आयु वर्गों के लिए लोकगीत एवं देशभक्ति गीत गायन प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसके बाद शाम 6 बजे स्थानीय कवि सम्मेलन होगा। आयोजकों ने आगरा के विद्यार्थियों, शिक्षकों, साहित्यप्रेमियों और आम नागरिकों से मेले में पहुंचकर किताब खरीदने के साथ पुस्तक-संस्कृति को मजबूत करने की अपील की है।