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Agra News: Seminar on “The Relevance of Shri Ramcharitmanas” held in Agra…#agranews

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आगरालीक्स…आगरा में हुई “श्री रामचरितमानस की प्रासंगिकता” पर गोष्ठी. महंत योगेशपुरी बोले—श्री रामचरितमानस के एक-एक अक्षर में निहित है जीवन को दिशा देने वाली ऊर्जा

श्री रामचरितमानस”—इन तीन शब्दों में ही जीवन की संपूर्ण साधना और संस्कार का सार छिपा हुआ है। मानस अर्थात मन, चरित अर्थात आचरण और मानस के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श जीवन। जब मन निर्मल होगा तो चरित्र स्वतः शुद्ध होगा और जब मन एवं चरित्र दोनों पवित्र हो जाएंगे तो प्रभु श्रीराम की कृपा प्राप्त होना निश्चित है। श्री रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण का जीवन-दर्शन है। इन्हीं भावों को केंद्र में रखते हुए तारक सेवा संस्था, अयोध्या शोध संस्थान एवं बयार फाउंडेशन लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जयंती पखवाड़ा के अंतर्गत “श्री रामचरितमानस की प्रासंगिकता” विषय पर विचार गोष्ठी एवं काव्यांजलि का आयोजन खंदारी बाईपास रोड स्थित विक्रम पैलेस होटल में किया गया। गोष्ठी में विद्वानों, संतों एवं साहित्यकारों ने वर्तमान सामाजिक परिवेश में श्री रामचरितमानस की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।

कार्यक्रम का शुभारंभ अपर जिलाधिकारी प्रशासन आजाद भगत सिंह, श्रीमहंत योगेश पुरी, प्रो उमापति दीक्षित, अशोक चौबे, बीना लवानिया एवं गीता मनीषी प्रो हरिवंश पांडे द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। अंतरराष्ट्रीय कवयित्री डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने मां सरस्वती के चरणों में अपनी काव्य प्रस्तुति “मां शारदे वरदान दे” अर्पित कर वातावरण को साहित्यिक एवं आध्यात्मिक भावों से भर दिया। इसके पश्चात संतोष तिवारी ने श्रीराम स्तुति को स्वर देकर श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। तारक सेवा संस्था के अध्यक्ष प्रो उमापति दीक्षित ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि आज समाज में जिन परिस्थितियों और घटनाओं को हम देख रहे हैं, उनका संकेत संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही श्री रामचरितमानस की चौपाइयों के माध्यम से कर दिया था। तुलसीदास जी युगदृष्टा संत थे, जिन्होंने तत्कालीन समाज के साथ-साथ आने वाले समय की सामाजिक चुनौतियों को भी समझा।

उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को माता-पिता के प्रति समर्पण, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और रिश्तों की मर्यादा का अर्थ समझाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि“रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाए पर वचन न जाई॥”
यह चौपाई केवल कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन में वचन, विश्वास और मर्यादा की प्रतिष्ठा का मंत्र है।
मुख्य वक्ता श्री मनःकामेश्वर मंदिर के श्रीमहंत योगेश पुरी ने कहा कि आज के समय में श्री रामचरितमानस की प्रत्येक चौपाई और उसका प्रत्येक अक्षर मनुष्य को ऊर्जा देने वाला है। उन्होंने कहा कि “श्री रामचरितमानस” के इन तीन शब्दों में जीवन का गहरा दर्शन छिपा है। मानस अर्थात हमारा मन यदि शुद्ध होगा तो चरित्र अपने आप शुद्ध होने लगेगा और जब मन तथा चरित्र दोनों शुद्ध हो जाएंगे तो प्रभु श्रीराम की कृपा सदैव प्राप्त होगी।
उन्होंने कहा कि मानस के प्रसंगों को यदि हम केवल कथा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के संदेश के रूप में देखें तो प्रत्येक प्रसंग आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

गंगा पार करने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम जब नाव पर सवार होते हैं तो वे पहले माता सीता को नाव पर चढ़ाते हैं। यह प्रसंग प्रत्येक पुरुष को अपनी अर्धांगिनी के प्रति सम्मान, सुरक्षा और जिम्मेदारी का संदेश देता है। परिवार तभी मजबूत होगा, जब पति-पत्नी एक-दूसरे का हाथ थामकर जीवन के भवसागर को पार करने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि निषादराज से प्रभु श्रीराम की मित्रता सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देती है। यह मित्रता समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाली थी। वहीं लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रभु श्रीराम ने विभीषण को लंका का राज्य सौंप दिया। यह बताता है कि वास्तविक विजय किसी सत्ता को अपने पास रखने में नहीं, बल्कि योग्य व्यक्ति को उसका अधिकार सौंपने में है।

उन्होंने कहा कि— “परहित सरिस धरम नहि भाई।पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥” आज के समाज में यदि इस एक चौपाई को जीवन का आधार बना लिया जाए तो अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान संभव है। वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए श्रीमहंत योगेश पुरी ने शबरी प्रसंग को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम स्वयं शबरी की कुटिया तक पहुंचते हैं। इसका संदेश स्पष्ट है कि रामराज की स्थापना तभी संभव है, जब शासन और राजसत्ता समाज की अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। विभीषण प्रसंग पर उन्होंने कहा कि यद्यपि विभीषण को प्रभु श्रीराम की कृपा और मित्रता प्राप्त हुई, लेकिन समाज में आज भी अपने बच्चों का नाम विभीषण रखने की परंपरा नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा संदेश है कि व्यक्ति चाहे कितना ही गुणवान क्यों न हो, यदि वह राष्ट्र के प्रति विश्वासघात करता है तो उसे आदर्श के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा किसी भी समाज की आधारशिला है।

गीता मनीषी प्रो हरिवंश पांडे ने कहा कि श्रीरामचरितमानस की प्रत्येक चौपाई अपने आप में सिद्ध मंत्र के समान है। उन्होंने हनुमान चालीसा एवं गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान बाहुक का उल्लेख करते हुए कहा कि तुलसीदास जी की रचनाओं में भक्ति के साथ जीवन की गहरी साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा निहित है। योगी सूर्यनाथ ने संस्कृत में काव्य पाठ प्रस्तुत कर उपस्थितजनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में श्री रामलीला में राजा दशरथ के स्वरूप संजय सिंघल एवं उनके पुत्र रजत सिंघल का विशेष सम्मान किया गया। मानस पर शोध कार्य करने वाले योगीराज को भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन पदम गौतम ने किया। इस अवसर पर आचार्य उमाकांत पाराशर, नंद नंदन गर्ग, प्रभुदत्त उपाध्याय, आनंद राय, दीपक चौबे, रवि चौबे, डॉ. भोजराज शर्मा, वंदना पाराशर, प्रीति यादव, सपना संकल्प आदि उपस्थित रहे।

Written by
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