आगरालीक्स…44 साल की महिला की छाती में समाए पेट और आंतें. आगरा के एसएन में लैप्रोस्कोकि विधि से बिना बड़ा चीरा लगाए हुआ आपरेशन. गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के डॉ. अभिषेक अरोड़ा व टीम का कमाल; अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशित होगा यह दुर्लभ केस
सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (एसएनएमसी) के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग ने चिकित्सा जगत में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विभाग के चिकित्सकों ने एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल बीमारी—’जाइंट टाइप-4 पैराएसोफेगल हर्निया’—से पीड़ित 44 वर्षीय महिला का बिना बड़ा चीरा लगाए, आधुनिक लैप्रोस्कोपिक (दूरबीन) विधि से सफल ऑपरेशन कर नया जीवन प्रदान किया है। इस केस की दुर्लभता और सफल उपचार को देखते हुए इसे एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशन के लिए भेजा जा रहा है।
सांस फूलने से बेहाल थी मरीज, फेफड़ों पर था भारी दबाव
मरीज पिछले काफी समय से अत्यधिक सांस फूलने और सीने में बेचैनी की समस्या से जूझ रही थी। जांच में फेफड़ों पर भारी दबाव दिखने के बाद जब सीटी स्कैन कराया गया, तो चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। डायाफ्राम (पेट और छाती को अलग करने वाली मांसपेशी) में एक विशाल छेद हो जाने के कारण महिला का पूरा आमाशय (पेट), बड़ी आंत (ट्रांसवर्स कोलन), छोटी आंत के हिस्से और ओमेंटम (चर्बी की परत) खिसककर छाती में फेफड़ों और दिल के पास पहुंच चुके थे। इस कारण फेफड़े फैल नहीं पा रहे थे और मरीज की सांस उखड़ रही थी।
दूरबीन विधि से हुआ जटिल ऑपरेशन
पारंपरिक तौर पर ऐसे मामलों में छाती और पेट को काटकर एक अत्यंत जोखिम भरा ‘ओपन’ ऑपरेशन किया जाता है। हालांकि, गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक अरोड़ा के नेतृत्व में टीम ने इसे मिनिमली इनवेसिव (लैप्रोस्कोपिक) तकनीक से करने का निर्णय लिया। मात्र 5 से 10 मिमी के छोटे छेदों के जरिए दूरबीन से देखते हुए छाती में पहुंचे सभी अंगों को सुरक्षित वापस पेट में अपनी प्राकृतिक जगह पर लाया गया। डायाफ्राम के छेद की मरम्मत की गई और भविष्य में एसिड रिफ्लक्स से बचाव के लिए ‘टूपेट फंडोप्लीकेशन’ (Toupet Fundoplication) प्रक्रिया सफलतापूर्वक की गई।
सर्जरी, एनेस्थीसिया और आईसीयू टीम का समन्वित प्रयास
इस हाई-रिस्क सर्जरी की सफलता में विभिन्न टीमों का तालमेल बेहद अहम रहा। सर्जिकल टीम में मुख्य सर्जन डॉ. अभिषेक अरोड़ा के साथ डॉ. लवीना, डॉ. निखिल, डॉ. श्रुति और डॉ. विशाल शामिल रहे, जबकि ऑपरेशन थिएटर सहयोग में जसवंत और जयकिशन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छाती में अंगों के जमाव के कारण मरीज को बेहोशी देना और फेफड़ों को वेंटिलेशन पर संभालना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे एनेस्थीसिया टीम ने कुशलतापूर्वक संभाला। वहीं ऑपरेशन के बाद मरीज की त्वरित रिकवरी में आईसीयू टीम की गहन देखरेख का विशेष योगदान रहा।
मरीज पूरी तरह स्वस्थ, मिली छुट्टी
न्यूनतम चीर-फाड़ की वजह से मरीज को असहनीय दर्द से मुक्ति मिली और वह अगले ही दिन सामान्य रूप से चलने-फिरने व भोजन करने लगी। सांस की तकलीफ पूरी तरह दूर होने के बाद मरीज को स्वस्थ हालत में अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है। डॉ. अभिषेक अरोड़ा ने बताया कि टाइप-4 पैराएसोफेगल हर्निया चिकित्सा इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है। सरकारी मेडिकल कॉलेज में ऐसे जटिल केस का दूरबीन विधि से सफल उपचार संस्थान के लिए गौरव की बात है, जिसके विस्तृत निष्कर्ष जल्द ही अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में साझा किए जाएंगे।