आगरालीक्स …Agra News: छोटी छोटी बातों पर पति पत्नी में झगड़ा, बच्चों की कस्टडी, आगरा सहित उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में 4 लाख 7 हजार 130 मामले लंबित हैं। छह जिलों में सबसे ज्यादा मामले।
आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता केसी जैन द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के संयुक्त रजिस्ट्रार, केंद्रीय सहायक जन सूचना अधिकारी द्वारा आरटीआई आवेदन के जवाब में दी गई जानकारी में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश की फैमिली कोर्ट्स में वर्ष 2025 के अंत तक 4 लाख 7 हजार 130 मामले लंबित हैं। यानी हर दिन हजारों परिवार सिर्फ कोर्ट की तारीख के इंतजार में जी रहे हैं, जबकि कानून कहता है कि वैवाहिक विवादों का निस्तारण त्वरित गति से होना चाहिए।
विशेष रूप से आगरा की स्थिति
आगरा फैमिली कोर्ट का हाल भी राहत देने वाला नहीं है। यहां लंबित मामलों की संख्या पिछले पांच वर्षों से 10,700 से 11,600 के बीच बनी हुई है — यानी जितने मामले निस्तारित होते हैं, लगभग उतने ही नये दर्ज हो जाते हैं, जिससे पेंडेंसी कभी वास्तविक रूप से कम नहीं हो पाती। वर्ष 2025 में आगरा में लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 11,600 तक पहुंच गई, जो 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।
- प्रत्येक जिले में जनसंख्या व पेंडेंसी के अनुपात में अतिरिक्त फैमिली कोर्ट्स/अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाए, विशेष रूप से लखनऊ, कानपुर नगर, इलाहाबाद, आगरा व बरेली जैसे अधिक बोझ वाले जिलों में।
- फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 की मूल भावना के अनुरूप पहले मीडिएशन/सुलह-समझौते (Conciliation) को अनिवार्य रूप से प्रभावी बनाया जाए, ताकि अधिक से अधिक मामले कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही सुलझ जाएं।
- लंबित पुराने (3 वर्ष से अधिक) मामलों के निस्तारण हेतु प्रत्येक जिले में समय-समय पर विशेष लोक अदालत/फास्ट-ट्रैक अभियान चलाए जाएं।
- भरण-पोषण व बाल हित से जुड़े अंतरिम आवेदनों (Interim Applications) की सुनवाई हेतु पृथक साप्ताहिक तारीख-व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि पीड़ित पक्ष को राहत में देरी न हो।
- केस प्रबंधन प्रणाली को डिजिटाइज़ कर ई-फाइलिंग, ई-नोटिस व वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अनावश्यक तारीखों व विलंब को कम किया जाए।
- उच्च न्यायालय स्तर पर प्रत्येक तीन माह में पेंडेंसी की समीक्षा हो तथा सर्वाधिक बोझ वाले जिलों की फैमिली कोर्ट्स को प्राथमिकता के आधार पर संसाधन (स्टाफ, कोर्ट रूम, स्टेनोग्राफर) उपलब्ध कराए जाएं।
- अधिवक्ताओं व पक्षकारों के बीच अनावश्यक स्थगन (Adjournment) पर रोक हेतु स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
परिवार न्यायालयों में आनलाइन सुनवाई हेतु जनहित याचिका लंबित
अधिवक्ता के0सी0 जैन द्वारा परिवार न्यायालयों में टैक्नोलाॅजी के उपयोग से विवादों का शीघ्र निस्तारण हो सके इस दृष्टि से मा0 सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने जनहित याचिका रिट पिटीशन सिविल सं0 667 वर्ष 2024 में प्रस्तुत की हुई है जिसमें सुनवाई उपरान्त नोटिस दिनांक 21.10.2024 को जारी किये जा चुके हैं कि परिवार न्यायालयों में आॅनलाइन सुनवाई हो। सुप्रीम कोर्ट से यदि सकारात्मक निर्णय हो जाता है तो अधिवक्ता जैन के अनुसार परिवार न्यायालयों में लम्बित मामलों की सुनवाई शीघ्रता से हो सकेगी क्योंकि प्रायः वैवाहिक विवादों में एक पक्षकार (पति या पत्नी) दूसरे जनपद व राज्यों का है जिसके कारण सुनवाई के अन्दर प्रायः विलम्ब हो जाता है। इस मामले में सुनवाई हेतु अग्रिम तिथि 17.07.2026 नियत है।