आगरालीक्स…मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा’, टेसू-झांझी की अमर प्रेम कहानी, दशहरा से शरद पूर्णिमा तक चलने वाली इस विलुप्त होती प्रथा के बारे में जानें, क्या है इसका महत्व
ज्योतिषाचार्य हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया की टेसू की कथा भीम के पौत्र बर्बरीक को लेकर प्रचलित है. इसमें टेसू बर्बरीक का और झांझी उनकी होने वाली पत्नी का प्रतीक है. यह कहानी टेसू और झांझी के अधूरे प्रेम की है. इस दौरान टेसू-झांझी के विवाह में सारी रस्में निभाई जाती है, लेकिन सातवें फेरे से पहले टेसू का सिर उखाड़ दिया जाता है. वहीं झांझी भी अंत में पति वियोग में सती हो जाती है. प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े की विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है. टेसू-झांझी की इस परंपरा को आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग जिंदा रखे हुए हैं.
आज के बदलते परिवेश व डिजिटल युग में टेसू व झांझी इतिहास की एक धुंधली कहानी बनकर रह गया है. हालांकि विलुप्त हो रही इस प्राचीन परंपरा को आज भी देहात क्षेत्र के बच्चे जीवित बनाए हुए हैं. एक दशक पहले हर साल शहर की गलियों में जब छोटे बच्चे और बच्चियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर निकलते थे, गाना गाकर चंदा मांगते थे, तो कोई एक परिवार झांझी के लिए जनाती और दूसरा परिवार टेसू की तरफ से बराती होता था. लेकिन अब यह परंपरा शहरों से विलुप्त होती जा रही है. लेकिन वर्तमान में इसका असर केवल ग्रामीण अंचल में ही दिखाई देता है. इस अनोखे उत्सव का आयोजन कार्तिक पूर्णिमा तक होता है.
टेसू के रे टेसू के टेसू बैठों आंगन में.., टेसू रे टेसू घंटार बजईयों, नौ नगरी के गांव बसइयो, बस गई नगरी बस गए मोर, हरी चिरैया को ले गए चोर। अंगना में बोली कोयल, पिछवाड़े बोले मोर, चली है प्यारी झेंझी, हम सबसे मुखड़ा मोड़ आदि लोक गीत बच्चों के समूह के द्वारा हाथों में टेसू व झेंझी लेकर गाते हुए कानों में कभी रस घोलते थे। भौतिकता की दौड़ में यह परंपरा लुप्त हो रही है। अब न बच्चों में पहले जैसा उत्साह रहा है और न झेंझी-टेसू की बिक्री। एक समय था जब बच्चे समूह बनाकर टेसू व झेंझी लेकर घर-घर जाते थे। लड़कों के हाथ में टेसू व लड़कियों के हाथ में दीपक की रोशनी से जगमगाती झांझी हुआ करती थी। लोग उन्हें दक्षिणा व अनाज देकर विदा करते थे।
महाभारत के समय की प्रथा –
टेसू-झेंझी की कथा महाभारत से जुड़ी हुई है। भीम पुत्र बर्बरीक का श्रीकृष्ण ने सर काटकर पेड़ पर रख दिया था। ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया जब सर शांत नहीं हुआ तो श्रीकृष्ण ने मायारुपी झेंझी से उसका विवाह संपन्न कराया। वहीं दूसरी कहानी के अनुसार एक ब्राह्मण की पुत्री पर मोहित होकर टेसू नामक राक्षस विवाह करता है। आधे विवाह दौरान राक्षस को ब्राह्मण के परिवार के लोग खत्म कर देते है बाद में कन्या को भी। इसी लिए उनका आधा विवाह होने के बाद तोड़ दिया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि हिंदू धर्म में विवाह शुरु होने से पहले टेसू-झेंझी का विवाह कराते हैं कि जो विध्न बाधा आए इन्हीं के विवाह में आ जाए बाद में कोई दिक्कत हो।
विलुप्त होती प्रथा –
दशहरा के दिन से टेसू व झेंझी का त्यौहार शुरू होता है और शरद पूर्णिमा को दोनों के विवाह के साथ इन्हें जलासय में विसर्जित कर देते हैं। आधुनिकता ने टेसू झांझी की संस्कृति लगभग समाप्त ही कर दी है। वह दिन दूर नहीं जब टेसू-झांझी सिर्फ कहानी बनकर रह जाएंगे। नए दौर के बच्चे कंप्यूटर, वीडियो गेम, मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। टेसू और झांझी और इनके गीत अब सिर्फ देहात क्षेत्र में ही कहीं-कहीं सुने जाते हैं वह भी चुनिंदा बच्चों के समूह में।
ऐसे होते हैं टेसू-झेंझी –
टेसू तीन लकड़ियों को जोड़ कर बनाते हैं। एक लकड़ी पर मनुष्य की आकृति का खिलौना होता है। बीच में दीपक रखने के लिए जगह होती है। झांझी मिट्टी की एक छोटी मटकी होती है जिसमें काफी छेद होते हैं। अंदर दीपक रखा जाता है जिसका प्रकाश छेदों से छन छन कर बाहर आता है।
विशेष मुहूर्त
टेसू और झेझी की परंपरा के अनुसार दशहरा से लेकर शरद पूर्णिमा तक पांच दिन बच्चे सुबह और सायंकाल घर-घर जाकर टेसू और झांझी के मनोहारी गीत सुनाते हैं और लोगो से नेक त्योहारी मांगते हैं शरद पूर्णिमा वाले दिन बच्चे अपने टेशु और झांझी को किसी भी नदी या तालाब में विसर्जित करते हैं जिससे इसका समापन होता है इसका समय सुबह 7:00 बजे से लेकर 10:00 बजे तक और सायं काल 6:30 बजे से लेकर 8:00 के बीच माना जाता है रात्रि के समय टेशु और झांझी में रोशनी के लिए दीपक जलाने की भी प्रथम होती है जिसमें रोशनी उजाला होता है यह प्रथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है क्योंकि बर्बरीक ने भगवान कृष्ण से यह वरदान मांगा था कि प्रभु मैं बालपन में ही मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूं मैं जीवन में ना बच्चों के संग में खेल सका न तीज त्यौहार या विवाह शादियों को देख पाया इसी वरदान के तहत टेशु झांझी खेलने की परंपरा दशहरा से लेकर शरद पूर्णिमा तक हर वर्ष होती चली आ रही है