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श्मशान घाट की खामोशी को चीरती आवाज

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आगरालीक्स…… श्मशान घाट की खामोशी को चीरती आवाज, सामने बैठे 94 साल के ये शख्य कभी न खुलने वाली नींद में सो चुके हैं, वे अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन इस दुनिया से जाने से पहले उन्होंने लोकनाट्य भगत की उम्र बढा दी, या यूं कहें कि भगत को नर्इ् जिंदगी दे दी, अब उसका लालन, पालन और युवा अवस्था में वह भटक न जाए, इसका ध्यान हम सभी को रखाना है। रेप जैसे ज्वलंट मुददे को लोकनाट्य भगत से युवाओं के बीच में पेश करने का हौसला दिखाने वाले खलीफा फूल सिंह यादव, अंतिम संस्कार से पहले श्मशान घाट पर उनक शार्गिदों ने भगत की रचनाओं को पेश किया और इस शरीर को छोड चुके खलीफा फूल​ सिंह इस पल के साक्षी बने, इसके बाद ही अंतिम संस्कार किया गया।
5 साल की उम्र से भगत
स्वः पन्नालाल यादव और स्वः रामप्यारी यादव के तीसरे पुत्र के रूप में जन्में श्री यादव ने पांच वर्ष की आयु में ही आगरा में बाल अभिनेता के रूप में लोकनाट्य भगत में प्रवेश किया। बाल श्रमिक होने के बावजूद गायनकला उनके गले में उतरने लगी और यही कारण है कि 18 वर्ष की आयु में गुरू अगनलाल ने उन्हें भगत अखाड़ा गुरू दुर्गदास में खलीफा के रूप में पगड़ी बांधी।
60-70 के दशक में जब लोकनाट्य भगत लुप्त होती चली गई तो अपने अखाड़े के साथ खलीफा जी भी निष्क्रिय हो गए।
रंगलीला के साथ छेडा आंदोलन
2006 में जब नाट्य संस्था रंगलीला ने भगत के पुनर्जागरण का आंदोलन छेड़ा तो इस आंदोलन में सबसे बाद में लेकिन इतनी आयु, खराब स्वास्थ्य और आंखों से कम देख पाने के बावजूद उन्होंने भगत पुनर्जागरण आंदोलन की कमान संभाली और अंतिम सांस लेने तक वो इससे जुड़े रहे। प्रदेश के संस्कृति विभाग ने उन्हें अपनी वृद्ध कलाकार पेंशन योजना से नवाजा था। गुरू फूलसिंह यादव कहने को साक्षर नहीं थे लेकिन संस्कृति की प्रगतिशील धारा के अनुयायी थे। उन्होंने समसामयिक विषयों को लेकर भी भगत लिखी। लोकनाट्य भगत में जब पहली बार महिला पात्रों को उतारने का निर्णय लिया गया तो खलीफा ने उस निर्णय का आगे बढ़-चढ़कर स्वागत किया और अपने निर्देशन में 400 साल के इतिहास में पहली बार महिला पात्रों को भगत के मंच पर उतारा।

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