आगरालीक्स…पेड़ों को काटना अपराध है और गमलों के टूटने पर चुप्पी साधना ? ठगा हुआ शहर अब सवाल नहीं पूछता, रहनुमा खुद भी मौन हैं
आगरा में गलत को देखकर भी सब मौन हैं। कोई सवाल करने वाला नहीं है, शायद इसलिए कोई सुधार करने वाला भी नहीं है। हाईवे और एमजी रोड पर यह गमले यह बड़े—बड़े गमले हरे—भरे आगरा के सपने दिखाकर लगाए गए थे। अब 45 डिग्री की गर्मी में प्यासे और झुलसते पौधों और ठोकरें खाकर टूटते गमलों को देखना यहां से गुजरने वालों को किसी तीर की तरह चुभता है। एक जमाने से सुनते आए हैं कि पेड़ों को काटना अपराध है, ऐसे में गमलों को टूटते देखना इस तकलीफ को और भी बढ़ा देता है। तस्वीरों में जो आप देख रहे हैं वह स्थिति तो केवल सुल्तानंज की पुलिया पर चंद कदमों के बीच है। असली हालत तो और भी गंभीर है। 45 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच चिलचिलाती धूप में मेट्रो का काम भी अजब—गजब तरीके से चल रहा है। काम के बीच अगर यह गमले बाधा बन भी रहे हैं तो इन्हें शिफ्ट किया जा सकता है, मगर अफसोस जो मशीनें भारी भरकम गार्डर और पिलर उठा लेती हैं वह इन गमलों को नहीं उठा पा रही हैं।इससे पहले मई के महीने में नगर निगम भी एक शाबाशी भरा काम कर चुका है। भीषण गर्मी, चिलचिलाती धूप और 42 डिग्री सेल्सियस तापमान में हाईवे पर झुलस चुके पौधों को बदलवाने का प्रयास किया जा रहा था। बहरहाल सवाल यह है कि जब यह गमले रखवाए गए होंगे तो बजट पास कराने के लिए किस तरह के सपने दिखाए गए होंगे। जनता के टैक्स का कितना पैसा इसमें लगा होगा। इसका हिसाब देने वाला अब कौन है।
फिलहाल डिवाइडरों और फुटपाथ पर बड़े-बड़े गमलों में जो पौधे लगाए, उनमें से अधिकांश झुलस चुके हैं। ज्यादातर गमले क्षतिग्रस्त हैं। नगर निगम के टैंकरों पर एसटीपी के शोधित पानी से इनकी सिंचाई की व्यवस्था है, लेकिन गर्मी में पौधों के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।