आगरालीक्स…सावन के दूसरे सोमवार पर सोम प्रदोष का दुर्लभ संयोग. शिव कृपा का महा-अवसर. शिव भक्तों के लिए यह दोहरा वरदान…जानें पूरी जानकारी
श्रावण मास का दूसरा सोमवार इस बार अत्यंत दुर्लभ और फलदायी संयोग लेकर आ रहा है। इस दिन सावन सोमवार व्रत और सोम प्रदोष व्रत एक साथ पड़ रहे हैं. ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा के अनुसार शिव भक्तों के लिए यह दिन दोहरा वरदान है। ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी के अनुसार सावन का महीना और सोमवार दोनों ही भगवान शिव को समर्पित हैं, उस पर प्रदोष व्रत का जुड़ना इसे और भी शुभ बना रहा है।
पंचांग के अनुसार यह संयोग वर्षों में बनता है।
तिथि और कैलेंडर -पंचांग के अनुसार सावन 2026 का आरंभ 30 जुलाई गुरुवार से हुआ है, 28 अगस्त शुक्रवार तक चलेगा।
पहला सावन सोमवार: 3 अगस्त 2026
दूसरा सावन सोमवार + सोम प्रदोष व्रत: 10 अगस्त 2026, सोमवार
तीसरा सावन सोमवार + नाग पंचमी : 17 अगस्त 2026
चौथा सावन सोमवार: 24 अगस्त 2026
10 अगस्त को श्रावण कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि सुबह 08:00 बजे तक रहेगी, उसके बाद त्रयोदशी तिथि प्रारंभ होगी। पंचांग के अनुसार त्रयोदशी 11 अगस्त सुबह 04:54 तक रहेगी, इसलिए प्रदोष व्रत 10 अगस्त को ही मान्य होगा।
शुभ मुहूर्त – 10 अगस्त 2026
इस दिन पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बन रहे हैं –
ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04:22 से 05:05 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:00 से 12:53 बजे तक
सायाह्न संध्या मुहूर्त – शाम 07:05 से 08:09 बजे तक
प्रदोष काल (मुख्य पूजा काल) – शाम 07:05 से रात 09:14 बजे तक
निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:05 से 12:48 बजे तक (11 अगस्त)
प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में करना सर्वोत्तम माना जाता है।
इस संयोग का महत्व क्यों है खास ?
दोहरी कृपा : सावन सोमवार का व्रत मनोकामना पूर्ति, अखंड सौभाग्य और कष्ट निवारण के लिए रखा जाता है, वहीं सोम प्रदोष व्रत सभी पापों से मुक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।
दुर्लभ शिव संयोग : जब सावन सोमवार के साथ शिव से जुड़ा प्रमुख व्रत एक ही दिन आता है तो उसे बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन किया गया जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना फलदायी होता है।
सर्वार्थ सिद्धि योग : इस बार यह प्रदोष व्रत शुभ योगों में पड़ रहा है, जिससे पूजा का महत्व और बढ़ गया है।
पूजा विधि संक्षेप में –
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र (सफेद, हरा या नीला शुभ) धारण करें। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और श्वेत पुष्प अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” का निरंतर जाप करें।
शाम को प्रदोष काल में पुनः घी का दीपक जलाकर शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करें, प्रदोष व्रत कथा और शिव चालीसा का पाठ करें और आरती के बाद व्रत खोलें।