आगरालीक्स…संस्कृत केवल भाषा नहीं, ज्ञान और तकनीक की विरासत…आगरा के डीईआई में हुआ संस्कृत महोत्सव. रोजगार से एआई तक संभावनाओं पर हुआ मंथन
संस्कृत को केवल प्राचीन भाषा मानकर सीमित कर देना भारतीय ज्ञान-परम्परा के व्यापक आयामों को नजरअंदाज करना है। संस्कृत में विज्ञान, दर्शन, प्रबंधन और जीवन-दृष्टि से जुड़ा विपुल ज्ञान निहित है और आधुनिक दौर में यह भाषा कौशल, रोजगार और तकनीक से भी जुड़ रही है। यह विचार आर.बी.एस. कॉलेज, आगरा के प्राचार्य एवं विख्यात शिक्षाविद् प्रो. विजय श्रीवास्तव ने दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई) में संस्कृत सप्ताह महोत्सव के समापन समारोह में व्यक्त किए।
संस्कृत जीवन की शैली, ज्ञान की कुंजी
डीईआई के कला संकाय के संस्कृत विभाग की ओर से 24 से 31 अगस्त तक आयोजित संस्कृत सप्ताह महोत्सव का भव्य समापन सोमवार को कला संकाय में हुआ। महोत्सव का उद्देश्य विद्यार्थियों में संस्कृत भाषा, साहित्य, भारतीय ज्ञान-परम्परा और संस्कृति के प्रति रुचि एवं जागरूकता पैदा करना था। इस दौरान संस्कृत गीत गायन, कथा-वाचन, चित्रकला और काव्य-कण्ठपाठ सहित विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिनमें करीब 70-80 विद्यार्थियों ने उत्साह से भाग लिया।
समापन समारोह के विशिष्ट व्याख्याता प्रो. विजय श्रीवास्तव ने संस्कृत को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम मानने के बजाय ज्ञान की संरचना में निहित वैज्ञानिक और समग्र दृष्टि बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत जीवन की एक शैली है। देवभाषा संस्कृत मानव का संस्कार करते हुए उसे दैवत्व की ओर ले जाने का माध्यम है और मानवीय चेतना को व्यापक ब्रह्मांडीय दृष्टि से जोड़ती है। उन्होंने भारतीय ज्ञान-परम्परा में मौजूद वैज्ञानिक एवं दार्शनिक चिंतन का उल्लेख करते हुए आयुर्वेद, भगवद्गीता में निहित प्रबंधन के सूत्र और 108 संख्या के सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक संदर्भों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थों की पूर्णता के लिए भारतीय ज्ञान-परम्परा को समझना जरूरी है और इस परम्परा की गहरी समझ की प्रमुख कुंजी संस्कृत ग्रंथों में है।
रोजगार और कौशल से भी जुड़ रही संस्कृत
प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि वर्तमान समय में संस्कृत केवल पथ-प्रदर्शक भाषा नहीं रही, बल्कि रोजगार और कौशल विकास के अनेक अवसरों से भी जुड़ रही है। उन्होंने आगरा की संस्कृत परम्परा का उल्लेख करते हुए हेनरी रॉथ और दाराशिकोह जैसे संस्कृत-अध्येता विद्वानों को याद किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत के विकास, संरक्षण और प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी संस्कृत जानने वाले प्रत्येक व्यक्ति की है। वर्तमान समय में इस दायित्व को दृढ़ निष्ठा के साथ निभाने की आवश्यकता है।
संस्कृत में ज्ञान, गणना और तकनीक की संभावनाएं
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के निदेशक प्रो. सी. पटवर्धन ने संस्कृत को कौशल और तकनीक आधारित ज्ञान-तंत्र के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परम्परा की संवाहिका है। उन्होंने प्राचीन भारतीय चिंतन में जीवन, मृत्यु और आत्मा जैसे गहन विषयों पर हुए विमर्श का उदाहरण देते हुए यम-नचिकेता संवाद का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में निहित ज्ञान और गणनात्मक परम्परा को समझे बिना नए विचारों और नवाचार की दिशा को पूरी तरह समझना कठिन है। इसलिए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान-परम्परा का अध्ययन भी जरूरी है। इस अवसर पर उन्होंने नवीन एआई सॉफ्टवेयर ‘सर्वम्’ से उपस्थितजनों का परिचय कराया।
विद्यार्थियों को पुरस्कार और प्रमाण-पत्र
समारोह में कला संकाय की डीन प्रो. नीलू शर्मा और संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. अनीता मंचासीन रहीं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूजा ने किया। स्वागत उद्बोधन विभागाध्यक्ष डॉ. अनीता ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शोभा भारद्वाज ने प्रस्तुत किया। समारोह के अंत में संस्कृत सप्ताह के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र और पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। विद्यार्थियों ने पूरे आयोजन में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम में संस्कृत विभाग से डॉ. निशीथ गौड़, डॉ. रुबीना सक्सैना, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. शर्मिला सक्सैना, डॉ. नमस्या, डॉ. सुमन और डॉ. सूरज तथा संगीत विभाग से डॉ. शिवेन्द्र त्रिपाठी सहित अन्य शिक्षक उपस्थित रहे। संस्कृत सप्ताह महोत्सव का संयोजन संस्कृत विभाग की डॉ. पूजा और डॉ. शोभा भारद्वाज ने किया।