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Agra News : Supreme Court reserves verdict after completing hearing on regulation of medicine prices

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आगरालीक्स…11 हजार का इंजेक्शन 1.30 लाख में क्यों?, दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और मुनाफेखोरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त दिखा, वीडियो में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता केसी जैन से सुनें...

आगरा। दवाओं की एमआरपी और व्यापारिक मार्जिन के नियमन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता केसी जैन तथा डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली राशि के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठाए। सुनवाई में केंद्र सरकार ने मूल्य निर्धारण की नीतियों और सुधारों का पक्ष रखा। यह जानकारी आगरा में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने दी है।

₹11,000 का इंजेक्शन, अस्पताल में ₹1.30 लाख का बिल
सुनवाई में पीठ ने एक दवा वितरक की पत्नी के कैंसर उपचार का उदाहरण दिया। वितरक के अनुसार, जो इंजेक्शन उसे लगभग ₹11,000 में उपलब्ध था, अस्पताल ने बाहर से लाया गया वही इंजेक्शन लगाने से इनकार कर उसके लिए ₹1.30 लाख वसूले। अदालत ने इस बड़े अंतर का औचित्य पूछा। पीठ ने लगभग ₹15 में खुदरा विक्रेता को मिलने वाली ड्रिप लाइन के लिए मरीज से ₹250 वसूलने का उदाहरण भी उठाया।

अस्पतालों की लागत और मरीजों की सुरक्षा, दोनों पर चर्चा
निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने चौबीसों घंटे सेवाएं, सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बनाए रखने की लागत का उल्लेख किया। उन्होंने दवाओं के मार्जिन में कटौती से अस्पतालों के संचालन पर प्रभाव पड़ने की दलील दी। पीठ ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई और कहा कि अस्पताल चलाने की जरूरत दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन का औचित्य नहीं बन सकती।

केंद्र का पक्ष: किफायत के साथ उपलब्धता भी जरूरी
केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम कीमतों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सरकार मूल्य निर्धारण की नीतियों में लगातार समायोजन कर रही है। सरकार का पक्ष रहा कि दवाओं की किफायत के साथ उनकी उपलब्धता और औषधि क्षेत्र के सुचारु संचालन का भी ध्यान रखना जरूरी है।

137 कैंसर दवाओं पर केंद्र का कदम
इस बीच, केंद्र सरकार ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के लिए व्यापारिक मार्जिन सीमित करने की व्यवस्था अधिसूचित की है। इसके तहत व्यापारिक मार्जिन की सीमा जीएसटी रहित एमआरपी का 30 प्रतिशत रखी गई है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होनी हैं। संबंधित आकलन के अनुसार, इस व्यवस्था से दवाओं की एमआरपी में लगभग 20 से 70 प्रतिशत तक कमी और मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होने की उम्मीद है। ये अनुमानित लाभ है।

मौजूदा व्यवस्था में कहां है सुधार की जरूरत
औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती एमआरपी सामान्यतः निर्माता तय करते हैं। इनके लिए मुख्य सामान्य नियंत्रण यह है कि पिछले बारह महीनों में एमआरपी की वृद्धि 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। याचिका का प्रमुख प्रश्न है कि यदि शुरुआती कीमत ही बहुत अधिक रखी जाए, तो केवल बाद की मूल्य वृद्धि पर सीमा लगाने से मरीज को पर्याप्त सुरक्षा कैसे मिलेगी।

हालांकि, गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में हस्तक्षेप की शक्ति सरकार के पास मौजूद है। आदेश का पैराग्राफ 19 असाधारण परिस्थितियों में जनहित में किसी भी दवा की अधिकतम या खुदरा कीमत तय करने की अनुमति देता है। इसलिए मुद्दा मूल्य नियंत्रण की शक्ति के अभाव के साथ-साथ उसके दायरे और प्रभावी उपयोग का भी है।

याचिकाओं की प्रमुख मांगें
याचिकाओं में गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतों के नियमन, चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य अथवा मार्जिन सीमा तथा जेनेरिक नाम से दवाएं लिखने की अनिवार्यता जैसे विषय उठाए गए हैं। उद्देश्य दवा मूल्य निर्धारण को अधिक पारदर्शी बनाना और इलाज का आर्थिक बोझ कम करना है।

उचित मुनाफे के साथ सुलभ इलाज की अपेक्षा
केसी जैन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी उद्योग का विरोध करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना है जिसमें उचित मुनाफे के साथ मरीजों के हित भी सुरक्षित रहें। आवश्यक दवाएं और इलाज आम नागरिक की पहुंच में होने चाहिए। उन्हें उम्मीद है कि न्यायालय के निर्णय से अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत मूल्य व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त होगा।

Written by
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