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Shani Amavasya 2021 is on 10th July: Know why this Amavasya is special

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आगरालीक्स…10 जुलाई को है शनि अमावस्या. जानिए क्यों खास है ये अमावस्या. विशेष पूजा अर्चना कर पा सकते हैं संकटों से मुक्ति

10 जुलाई हो है शनैश्चरी अमावस्या
आषाढ़ कृष्ण पक्षदिन शनिवार 10 जौलाई 2021 को पडने वाली अमावस्या तिथि को देवकार्ये शनैश्चरी अमावस्या कहते है क्योंकि हर अमावस्या तिथि देव पितृकार्यों के लिए सर्वोत्तम तिथि मानी जाती है. शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या तिथि को शनैश्चरी अमावस्या कहते हैं. इसे शनि अमावस्या का नाम दिया गया है. यह तिथि अपने पूर्वजों को याद करने की एक महत्वपूर्ण तिथि है. इस दिन जिन लोगों की शनि की साढ़ेसाती खतरनाक स्थिति में चल रही है या जन्म कुंडली में शनि पीड़ित है या लोग शनि महादशा से त्रस्त हैं या व्यक्ति घर परिवार में किसी भी प्रकार के पूर्वजों के दोष से पीड़ित हैं वह व्यक्ति इस दिन अपनी विशेष पूजा अर्चना दान पुण्य के द्वारा अपने हर प्रकार के संकटों से मुक्ति पा सकते हैं.

मान्यता है कि जो मृत्यु पर्यन्त मृत आत्माएं पितृ लोक पंहुचती हैं। यह उनका एक प्रकार से अस्थाई निवास होता है और जब तक उनके भाग्य का अंतिम निर्णय नहीं होता उन्हें वहीं रहना पड़ता है

इस अवधि में उन्हें भूख और प्यास की अत्यंत पीड़ा सहन करनी पड़ती है क्योंकि वे स्वयं कुछ भी ग्रहण करने में समर्थ नहीं होते। उनकी इस पीड़ा का निवारण तभी होता है जब भू लोक से उनके सगे-संबंधि, परिचित या कोई भी उन्हें मानने वाला उनके लिये श्राद्ध दान तर्पण करता है

वैसे श्राद्ध पक्ष में हमेशा उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है जिस तिथि को दिंवगत आत्मा इस लोक से पर लोक गमन करती है लेकिन यदि यह संभव न हो और किसी कारण वह तिथि मालूम न हो तो प्रत्येक मास में आने वाली अमावस्या को या शनैश्चरी अमावस्या पर यह किया जा सकता है

साल में 12 अमावस्याएं आती हैं यदि निरंतरता में प्रत्येक अमावस्या को आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो कुछ अमावस्याएं विशेष तौर पर सिर्फ श्राद्ध कर्म के लिये शुभ मानी जाती हैं

कालसर्प दोष के निवारण के लिये पूजा भी अमावस्या के दिन विशेष रूप से की जाती है
♦️आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या
♦️आषाढ़ कृष्ण पक्षअमावस्या तिथि आरंभ –09 जौलाई 2021शुक्रवार को 05:17 प्रातः काल से
♦️आषाढ़ कृष्ण अमावस्या तिथि समाप्त –10 जौलाई 2021 शनिवार 06:46 प्रातः काल तक

शनि देव को वृद्धावस्था का स्वामी कहा गया है, जिस घर में माता पिता व वृद्ध जनों का सम्मान होता है उस घर से शनि देव बहुतप्रसन्न होते हैं तथा जिस घर में वृद्ध का अपमान होता है उस घर से खुशहाली दूर भागती है. जैसे-जैसे व्यक्ति वृद्ध होता है उसे भूख कम लगने लगती है।

नींद कम आती है वह काम वासना से विमुख हो जाता है। उसमे लोक कल्याण की भावना जाग्रत हो जाती है। ये सभी गुण देवताओंके हैं। कहने का तात्पर्य है की वृद्ध अवस्था में व्यक्ति देवत्व प्राप्त करता है।इसलिए पाठको को शनि कृपा प्राप्त करने के लिए वृद्ध जनों कीसेवा सर्वोपरि है।

शनि को दरिद्र नारायण भी कहते हैं इसलिए दरिद्रो की सेवा से भी शनि प्रसन्न होते हैं।

असाध्य व्यक्ति को काला छाता, चमडे के जूते चप्पल पहनाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं।

शनि देव को उड़द की दाल की बूंदी के लड्डू बहुत प्रिय है अत: शनिवार को लड्डू का भोग लगाकर बांटना चाहिए।

शनिवार को तेल मालिश कर नहाना चाहिए।

लोहे की कोई वस्तु शनि मंदिर दान करनी चाहिए. वह वस्तु ऐसी हो जो मंदिर के किसी काम आ सके।

शनि मंदिर में बैठकर ॐ प्रां प्रीं प्रों शनेश्चराय नमः,या ओम श्री शनि देवाय नमः ,या.ओम श्री शनैश्चराय नमः का जाप करना चाहिए।

शनि से उत्पन्न भीषण समस्या के लिए भगवान भोलेनाथ व हनुमान जी की पूजा एक साथ करनी चाहिए. शनि चालीसा, शिव चालीसा,बजरंगबाण, हनुमान बाहुक व हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।

शनि सम्बन्धी कथा पढ़े।
नीलम रत्न के साथ पन्ना रत्न भी धारण करें।
मछलियों को आटे की गोलियां खिलाएं।
शनि अमावस्या वाले दिन व हर शनिवार और मंगलवार को काले कुत्ते को मीठा पराठा खिलायें।
भैरव उपासना भी अनिष्ठो में सर्वाधिक लाभदायक है।
ताप के रूप में शनिवार का श्री हनुमान जी व शनि मंदिर में पीपल का पेड़ हो तो संध्या के समय दीपक जलना शनि, हनुमान और भैरव जी के दर्शन अत्यंत लाभकारी है।
कपूर को नारियल के तेल में डालकर सिर में लगायें, भोजन में उड़द की दाल का अत्यधिक सेवन करें, झूठ, कपट, मक्कारी धोखे से बचे, रहनेके स्थान पर अँधेरा, सूनापन व खंडहर की स्थति न होने दे।
शनिवार को काले तिल का कपडछन पावडर चुटकी व दो बूंद सरसों का तेल पानी में डालकर तिलातेल स्नान करें।
शनि मंदिर में जाकर कम से कम परिक्रमा व दंडवत प्रणाम करें।
16 शनिवार सूर्यास्त्र के समय एक पानी वाला नारियल, ५ बादाम, कुछ दक्षिणा शनि मंदिर में चढायें।
शनि मंदिर से शनि रक्षा कवच या काला धागा हाथ में बांधने के लिए अवश्य लें।
शनि की शुभ फल प्राप्ति के लिए दक्षिण दिशा में सिराहना कर सोयें. व पश्चिम दिशा में मुख कर सारे कार्य करें व अपने देवालय में शनि काआसन अवश्य बनायेँ।
प्रत्येक शुभ कार्य में पूर्व कार्य बाधा निवारण के लिए प्रार्थना करके हनुमान व शनि देव के नाम का नारियल फोड़े।
प्रत्येक शनिवार को रात्रि में सोते समय आँखों में काजल या सुरमा लगायें व शनिवार का काला कपडा अवश्य पहने।
महिलाओं से अपने भाग्य उदय के लिए सहयोग, समर्थन व मार्गदर्शन प्राप्त करें तो प्रगति होगी।
अपनों से बड़ी उम्र वालें व्यक्ति का सहयोग प्राप्त करें व अपनी से छोटी जाती व निर्बल व्यक्ति की मदद करें।
प्रति महा की अमावस्या आने से पूर्व अपने घर व व्यापार की सफाई व धुलाई अवश्य करें व तेल का दीपक जलाएं।
शनि अमावस्या, शनि जयंती या शनिवार को बन पड़े तो शनि मंदिर में नंगे पैर जाएँ।
घर बनाते समय काली टायल, काला मार्बल या काले रंग की कुछ वस्तु प्रयोग में लायें।
खाली पेट नाश्ते से पूर्व काली मिर्च चबाकर गुड़ या बताशे से खाएं।
भोजन करते समय नमक कम होने पर काला नमक तथा मिर्च कम होने पर काली मिर्च का प्रयोग करें।
भोजन के उपरांत लोंग खाये।
शनिवार व मंगलवार को क्रोध न करें।
भोजन करते समय मौन रहें।
प्रत्येक शनिवार को सोते समय शरीर व नाखूनों पर तेल मसलें।
शनि अमावस्या के दिन मॉस, मछली, मद्य तथा नशीली चीजों का सेवन बिलकुल न करें।
घर की महिला जातक के साथ सहानुभूति व स्नहे बरते. क्योकि जिस घर में गृहलक्ष्मी रोती है उस घर से शनि की सुख-शांति व समृद्धि रूठ जाती है. महिला जातक के माध्यम से शनि प्रधान व्यक्ति का भाग्य उदय होता है।
शनि अमावस्या के दिन गुड़ व चनें से बनी वस्तु भोग लगाकर अधिक से अधिक लोगों को बांटना चाहिए।
शनि अमावस्या के दिन उड़द की दाल के बड़े या उड़द की दाल, चावल की खिचड़ी बाटनी चाहिए. प्रत्येक शनिवार को लोहे की कटोरी में तेल भरकर अपना चेहरा देखकर डकोत को देना चाहिए. डकोत न मिले तो उसमे बत्ती लगाकर उसे शनि मंदिर में जला देना चाहिए।
प्रत्येक शनि अमावस्या को अपने वजन का दशांश सरसों के तेल का अभिषेक करना चाहिए।
शनि मृत्युंजय स्त्रोत दशरथ कृत शनि स्त्रोत का ४० दिन तक नियमित पाठ करें।
काले घोड़े की नाल अथवा नाव की कील से बना छल्ला अभिमंत्रित करके धारण करना शनि के कुप्रभाव को हटाता है।
जिस जातक के परिवार, घर में रिश्तेदारी, पड़ोस में कन्या भ्रूण हत्या होती है. जातक प्रयास कर इसे रोकेगा तो शनि महाराज उससे अत्यंतप्रसन्न होते है

कर्मों के अनुसार फल देते हैं शनिदेव जी”
प्रिय बन्धुओं शनिदेव कर्म प्रधान देवता हैं और वह मनुष्य के कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसीलिए शनिवार का दिन शनिदेव की पूजा के लिए खास माना जाता है। शनिदेव के अशुभ प्रभाव को कम करने व उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के पूजन किए जाते हैं। देखा जाता है कि शनिदेव की कृपा पाने के लिए लोग हर शनिवार शनिदेव पर तेल चढ़ाते हैं। अधिकांश लोग इस कर्म को शनि की कृपा प्राप्त करने की प्राचीन परंपरा मानते हैं। लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार शनिदेव को तेल से दर्द में राहत मिलती है और तेल चढ़ाने वाला उनका कृपापात्र हो जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब हनुमान जी पर शनि की दशा प्रांरभ हुई उस समय समुद्र पर रामसेतु बांधने का कार्य चल रहा था। राक्षस पुल को हानि पहुंचा सकते हैं, यह आशंका सदैव बनी हुई थी। इसलिए पुल की सुरक्षा का दायित्व हनुमान जी को सौपा गया था। लेकिन रामकाज में लगे हनुमान पर शनि की दशा आरम्भ होनी थी।
हनुमान जी के बल और कीर्ति को जानते हुए शनिदेव ने उनके पास पहुंच कर शरीर पर ग्रह चाल की व्यवस्था के नियम को बताते हुए अपना आशय बताया। जिस पर हनुमान जी ने कहा कि वे प्रकृति के नियम का उल्लघंन नहीं करना चाहते लेकिन राम-सेवा उनके लिए सर्वोपरि है।
शनिदेव ने हनुमान से मांगी अपने किए की क्षमा :~ उनका आशय था कि राम-काज होने के बाद ही शनिदेव को अपना पूरा शरीर समर्पित कर देंगे परंतु शनिदेव ने हनुमान जी का आग्रह नहीं माना। और वे अरूप होकर जैसे ही हनुमान जी के शरीर पर आरूढ़ हुए, उसी समय हनुमान जी ने विशाल पर्वतों से टकराना शुरू कर दिया। शनिदेव शरीर पर जिस अंग पर आरूढ़ होते, महाबली हनुमान उसे ही कठोर पर्वत शिलाओं से टकराते। फलस्वरूप शनिदेव बुरी तरह घायल हो गए। उनके शरीर पर एक-एक अंग आहत हो गया। शनिदेव जी ने हनुमान जी से अपने किए की क्षमा मांगी।
हनुमान जी ने शनिदेव से वचन लिया कि वे उनके भक्तों को कभी कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। आश्वस्त होने के बाद रामभक्त अंजनीपुत्र ने कृपा करते हुए शनिदेव को तिल का तेल दिया, जिसे लगाते ही उनकी पीड़ा शांत हो गई। तब से शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए उन पर तिल का तेल चढ़ाया जाता है।
छाया के गर्भ से हुआ शनि देव का जन्म :~ धर्मग्रंथों के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवान शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पीने तक की सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया। शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं है। तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे।

शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भांति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही है, मेरे पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित किया गया है। अतः माता की इच्छा है कि मेरा पुत्र अपने पिता से भी ज्यादा शक्तिशाली बने। तब भगवान शंकर जी ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे और शनिदेव जी न्यायधीश कहलाये गये। वे भगवान शनिदेव जी आप सभी पे कृपा बनाये रखें।

प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदयरंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार पुरानी कोतवाली सर्राफा बाजार अलीगढ़ यूपी व्हाट्सएप नंबर-9756402981,7500048250

Written by
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