
यह वही त्योहार है, जिसमें कई दिन पहले से होली का हुडदंग दिखाई देता था। दोस्त ही नहीं, दुश्मन और अपरिचित के रंग लगाना, कोई मना करे तो उसके साथ जबरदस्ती कर शरीर पर रंग पोतने का जो मजा था, वह हाई स्पीड जिंदगी में गायब हो गया है। कोई गाली दे तो मजा दोगुना हो जाता था, उस पर रंग डालने का अलग ही मजा था। यह समाज में आ रहा बदलाव घातक है। वैसे भी होली का त्योहार उमंग और उत्साह का होता है, दुश्मनी मिट जाती हैं और जिंदगी में उल्लास होता है।
अव्वल तो यह है कि यह त्योहार महंगा भी नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि महंगाई थी, इसलिए होली अच्छी तरह से नहीं मनाई जा सकी। कपडे पुराने, रंग भी सस्ता होता है, पिचकारी का काम हाथ और बाल्टी करते हैं। जरा सोचिए, जिंदगी में रंग न हो तो क्या मजा है, इसे रंगीन बनाए, होली हर रोज है, दिलो दिमाग से इसे खेलें।
आज बिरज में होरी रे रसिया,
होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया।
कोन के हाथ कनक पिचकारी,
कोन के हाथ कमोरी रे रसिया।।
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथ कमोरी रे रसिया।।
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
केसर रंग कौं घेरी रे रसिया।।
योगेंद्र दुबे
संपादक
agraleaks.com
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