आगरालीक्स…अगर माता पिता सक्षम होंगे तो ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में आएगा सुधार. चिकित्सकों ने बताए ऑटिज्म के लक्षण और किस तरह पेरेंट्स खुद रख सकते हैं ऐसे बच्चों का ध्यान
आटिज्म अवेरनेस डे के उपलक्ष में आईएपी आगरा ने सिकंदरा स्थित जीनियसलेन पल्स मेडिसिटी, चाइल्ड डेवेलोपमेंट सेंटर पर पब्लिक जागरूकता प्रोग्राम का आयोजन किया गया. इसमें आटिज्म से ग्रस्त बच्चों के माता-पिता को बीमारी के बारे में विस्तार से बताया. आईएपी आगरा अध्यक्ष डॉ. अरुण जैन ने बताया कि प्रत्येक वर्ष 2 अप्रैल को दुनियाभर में विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाने का मकसद हैं, लोगो को ऑटिज्म के बारे में जागरूक करना और ऑटिज्म से पीड़ित लोगो को सपोर्ट करना. कार्यक्रम का संचालन करने वाले एसएनएम्सी प्रोफेसर डॉ. नीरज यादव ने बताया कि इस वर्ष की थीम हैं – सक्षम माता-पिता, बेहतर सुधार.
एसएनएमसी प्रोफेसर डॉ. पंकज कुमार ने बताया कि स्वलीनता ऑटिज्म या ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक डेवलपमेंटल डिसेबिलिटी है जो किसी व्यक्ति की कम्युनिकेट करने और खुद को व्यक्त करने की क्षमता, दूसरों के व्यवहार और अभिव्यक्ति को समझना को प्रभावित करती है और सामाजिक कौशल को प्रभावित करती है। इस स्थिति से पीड़ित लोगों को स्वस्थ व्यक्तियों और सामान्य रूप से समाज के साथ बातचीत करने में परेशानी होती है। यहह सब बच्चे के तीन साल होने से पहले ही शुरु हो जाता है।
पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल अग्रवाल ने ऑटिज़्म होने के कारण बताये.
मस्तिष्क की गतिविधियों में असामान्यता होना,
मस्तिष्क के रसायनों में असामान्यता,
जन्म से पहले बच्चे का विकास सही रूप से न हो पाना आदि

एएचए सचिव डॉ. आरएन शर्मा के अनुसार हाल की एक समीक्षा के अनुमान के मुताबिक प्रति 1000 लोगों के पीछे दो मामले स्वलीनता के होते हैं, जबकि से संख्या एएसडी के लिये 6/1000 के करीब है। औसतन एसडी का पुरुष/महिला अनुपात 4,3ः1 है। आईएपी आगरा सेक्रेटरी डॉ. योगेश दीक्षित के मुताबिक मुख्य लक्षणों में शामिल हैं सामाजिक संपर्क में असमर्थता, बातचीत करने में असमर्थता, सीमित शौक और दोहराव युक्त व्यवहार है। साथ ही दूसरे लोगों के मंतव्यों को समझने में भी असमर्थ होते हैं इस कारण लोग अक्सर इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। सामाजिक असमर्थतायें बचपन से शुरु हो कर व्यस्क होने तक चलती हैं। ऑटिस्टिक बच्चे सामाजिक गतिविधियों के प्रति उदासीन होते है, वो लोगो की ओर ना देखते हैं, ना मुस्कुराते हैं और ज्यादातर अपना नाम पुकारे जाने पर भी सामान्यरू कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।, वो आँख नहीं मिलाते हैं और अपनी बात कहने के लिये वो अक्सर दूसरे व्यक्ति का हाथ छूते और हिलाते हैं।
मानसिक रोग संस्थान के मुख्य सुप्रीटेंडेंट डॉ. दिनेश राठौर के अनुसार सामान्य बच्चे माँ का चेहरा देखते हैं व उसके हाव-भाव को समझने की कोशिश करतें है परन्तु ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चे किसी से नज़र मिलाने से कतराते हैं, बच्चे अपनी ही किसी दुनिया में खोये रहतें हैं, बदलाव को बर्दास्त नहीं कर पाते तथा भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होते हैं। मोबाइल अत्याधिक इस्तेमाल से वर्चुअल आटिज्म के केस ज्यादा देखने को मिल रहे है इसलिए 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल का इस्तेमाल न करने दें।
सयुंक्त सचिव डॉ. राहुल पैंगोरिया केअनुसार ऑटिज़्म को शीघ्र पहचानना और विशेषज्ञ से तुरंत परामर्श ही इसका सबसे पहला इलाज है। ऑटिज़्म एक प्रकार की विकास सम्बंघित बीमारी है जिसे पूरी तरह तो ठीक नहीं किया जा सकता, परन्तु सही प्रशिक्षण व परामर्श के द्वारा रोगी को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है, जो उसे अपने रोज के जीवन में अपनी देखरेख करने में मदद करता है। साइंटिफिक सचिव डॉ. अतुल बंसल ने बताया विशेष थेरेपी और विशेष शिक्षा दी जाए तो उसे समाज के अभिन्न अंग के रूप में पूर्ण और सार्थक जीवन जीने योग्य बनाया जा सकता हैं।