आगरालीक्स…संस्कृत संस्कारों को समझने का विज्ञान है, इसके अध्ययन से हम स्वयं के साथ इस सृष्टि के काल और घटनाचक्र को भी समझ सकते हैं. विवि में 15 दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर शुरू
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ में संस्कृत विभाग के अंतर्गत 15 दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर का आज शुरभारंभ हो गया। इसमें मुख्य अतिथि संस्कृत विद्वान व आगरा कालेज के प्राचार्य प्रो. अनुराग शुक्ला और विशिष्ट वक्ता सेंट जोंस कालेज, संस्कृत विभाग की शिक्षिका डॉ. डौली शर्मा थीं। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. अनुराग शुक्ला ने अपने उद्बोधन का प्रारंभ संस्कृत के श्लोकों से किया और विद्यार्थियों को संस्कृत का महत्व समझाया कि आपका यह जीवन ही संस्कृत है। संस्कृत संस्कारों को समझने का विज्ञान है। इसके अध्ययन से हम स्वयं के साथ इस सृष्टि के काल और घटनाचक्र को भी समझ सकते हैं। संस्कृत धर्म का अभ्युद्य कर अधर्म का क्षरण करती है। संस्कृत का तत्व वाक्य यह है कि संस्कृत मात्र भाषा नहीं है, यह संपूर्ण संस्कृति का नाम है। इसलिए इसे सिर्फ भाषा मात्र में समेटने की गलती न करें, इससे इसका तत्व ही सिमट जाएगा। सिर्फ संस्कृत ही ऐसी भाषा है, जो हमें सिखाती है कि जीवन कैसे जीना है, सृष्टि के लिए क्या उपयोगी है, यह प्रकृति के सभी नियमों का सारगर्भित रूप है, इसलिए इसे जीवन के साथ संस्कारों की भाषा भी कहा जाता है। संस्कृत आज प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अनिवार्य होनी चाहिए, तभी उनमें संस्कारों और नैतिकता का उदय होगा। भारत की प्रतिष्ठा है संस्कृत भाषा और संस्कृति, प्रत्येक बच्चे को कम से कम इस विषय का बोध कराएं, निबंध तैयार कराएं, जिससे वह अन्य विषयों में स्वयं ही पारंगत होकर सकारात्मक भाव से आगे बढ़ेगा और उसका पूरा जीवन उपनिबंधित हो जाएगा।

एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए आपने कहा कि हमारे गुरुजी जब हमें डांटते थे, तो कहते थे कि तुम संस्कृत नहीं हो, तुम प्राकृत हो और जो अधिक शरारत करता उसे कहते तुम अपभ्रंश हो। इससे वह बड़ी मधुरता से हमें डांटकर संस्कृत समझा दिया करते थे। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी और संस्कृत में तीन पुरुष होते हैं। अंग्रेजी में पहला आई, दूसरा यू और तीसरे शेष सभी। इसी तरह संस्कृत में भी पुरुष तो तीन ही होते हैं, लेकिन पहला अतिथि, दूसरा मुझको छोड़कर शेषजन और अंत में उत्तम पुरुष बचता है, जो मैं स्वयं होता है। संस्कृत इंसान को उत्तम बनाने की शिक्षा देती है। संस्कृत हमें विद्या प्रदान कर विनय सिखाती है क्योंकि विनय से ही पुरुष सिद्ध होता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. डॉली शर्मा ने बताया कि संस्कृत को लेकर एक राय बन गई है कि यह मुश्किल और नीरस विषय है, लेकिन यदि थोड़ा मन लगाकर पढ़ा जाए, तो यह सबसे वैज्ञानिक भाषा है, जो शिक्षा के साथ संस्कार भी प्रदान करती है। इसको छोड़ने से हम संस्कारों में भी पिछड़ रहे हैं। इसलिए मै चाहूंगी कि हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थी कम से कम हिंदी के साथ संस्कृत अवश्य पढ़ें। इसे सिर्फ विषय के रूप में नहीं, जब संस्कृति के रूप में पढ़ेंगे, तो बेहतर समझ पाएंगे।
संस्थान निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने कार्यक्रम की विस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि संस्कृत सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। आज नासा और विश्व के अनेक वैज्ञानिक इसके श्लोकों के गूढ़ार्थ खोज रहे हैं और उनसे निकलने वाले ध्वनियों की व्यंजना पर शोध कर रहे हैं। आई.आई.टी. रूड़की ने भी अपने पाठ्यक्रम में संस्कृत को एक विषय के रूप में पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। आपने यह भी बताया कि इस शिविर में प्रतिभागियों को पूजा-पाठ में प्रयोग में आने वाले महत्वपूर्ण श्लोकों यथा- गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, स्तोत्र आदि के अर्थों से परिचित कराया जाएगा। डा. राजेंद्र दवे ने शिविर के उद्देश्यों की जानकारी दी। संचालन डॉ. वर्षा रानी और धन्यवाद ज्ञापन डा. केशव शर्मा ने दिया। डॉ. रणजीत भारती, डॉ. प्रदीप वर्मा, डॉ. अमित कमार सिंह, डॉ. आदित्य प्रकाश, मोहिनी दयाल, डॉ. रमा वर्मा आदि मौजूद रहे।
सात से 82 वर्ष तक के प्रतिभागी
इस 15 दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर में अब तक 140 से अधिक पंजीकरण हो चुके हैं। इनमें सबसे छोटी प्रतिभागी सात वर्ष की अनन्या हैं, जबकि सबसे अधिक उम्र के प्रतिभागी 82 वर्षीय लक्ष्मीनारायण हैं, जो शिविर के उद्घाटन में भी उत्साह के साथ शामिल हुए।