आगरालीक्स बच्चा स्वस्थ्य हो, यह डॉक्टरों के लिए चुनौती बनी हुई है। आगरा में हुई कांफ्रेंस में 20 सप्ताह के गर्भस्थ शिशु की अल्ट्रासाउंड जांच से विकृति से लेकर शारीरिक रचना का पता चल सकता है। कोई विकृति है तो गर्भपात ( मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ प्रिग्नेंसी) कराया जा सकता है। इसे लेकर शनिवार से होटल क्रिस्टल सरोवर प्रीमियर, फतेहाबाद में शुरू हुई इंडियन रेडियोलॉजिकल एंड इमेजिंग एसोसिएशन, ( आईआरआईए) यूपी चैप्टर की दो दिवसीय कार्यशाला में फीटल डेवलेप्मेंट एंड एनामलीज (गर्भस्थ शिशु के विकास और विकृति) पर चर्चा की गई।
आईआरआईए के नेशनल प्रेसीडेंट डॉ भूपेंद्र आहूजा ने बताया कि गर्भवती महिला का 11 से 14 सप्ताह पर अल्ट्रासाउंड कर गर्भस्थ शिशु में डाउन सिंड्रोम मंद बुद्धि होने की आशंका सहित अन्य जन्मजात विकृति का पता किया जा सकता है। डॉ अशोक खुराना, दिल्ली ने सेकेंड ट्रामेस्टर ( 20 सप्ताह) के दौरान अल्ट्रासाउंड से शाीरिक विकास, चेहरे की विकृति, गुर्दा हैं या नहीं, हार्ट के वॉल्व, हार्ट से जुडी हुई नसों की विकृति का पता चल सकता है। इसके लिए रेडियोलॉजिस्ट को ट्रेनिंग की जरूरत है। 20 सप्ताह तक जन्मजात विकृति होने पर गर्भपात कराया जा सकता है। अभी दो फीसद बच्चे जन्मजात विकृति के साथ पैदा हो रहे हैं, इसमें से कुछ ही मौत प्रसव के बाद ही हो जाती है। जबकि मंद बुद्धि बच्चे जन्म लेते हैं तो उनकी परवरिश में समस्या आती है। डॉ चंदर लुल्ला, मुंबई ने सोनोइम्ब्रायोलॉजी पर चर्चा की। कार्यशाला का शुभारंभ वरिष्ठ रेडयोलॉजिस्ट डॉ जीएस बाथला ने किया। इस दौरान डॉ प्रवीन, हेदराबाद, डॉ अखिलेश शर्मा, कानपुर, डॉ मोहम्मद खालिद अलीगढ, डॉ वजन माथुर, डॉ अरविंद गुप्ता आदि मौजूद रहे।
लिंग परीक्षण करने वालों की 24 घंटे में मेंबरशिप सस्पेंड
लिंग परीक्षण करते डॉक्टर पकडे जा रहे हैं। इसे लेकर नेशनल प्रेसीडेंट डॉ भूपेंद्र आहूजा का कहना है कि लिंग परीक्षण रेडियोलॉजिस्ट नहीं करते हैं, उनके पास बहुत काम है। अप्रशिक्षित और कुछ एमबीबीएस की डिग्री धारक जिनके पास काम नहीं है, वे कन्या भ्रूण हत्या का गंदा काम कर रहे हैं। चार महीने पहले दिल्ली के एक रेडियोलॉजिस्ट का नाम लिंग परीक्षण में आया था, 24 घंटे में उनकी मेंबरशिप सस्पेंड कर दी गई, दोषी पाए जाने पर मेंबरशिप समाप्त करने के साथ ही कोई भी लाभ नहीं दिया जाएगा।
पीसीपीएनडीटी एक्ट में हुआ संशोधन
डॉ भूपेंद्र आहूजा ने बताया कि लंबे समय से विरोध प्रदर्शन के बाद पीसीपीएनडीटी एक्ट में संशोधन किया गया है, अब अल्ट्रासाउंड से पहले भरे जाने वाले फॉर्म में क्लॉज ती से छह तक दी गई जानकारी गलत होने पर डॉक्टर दोषी नहीं होंगे। यह ब्योरा मरीज द्वारा दिया जाता है और वही दोषी होगा।
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