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Agra News: Proposal of challan through fast tag to stop over speeding on expressway and highway. Petition filed in Supreme Court…#agranews

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आगरालीक्स…एक्सप्रेस वे और हाइवे पर कैमरों को चकमा देकर हो रही ओवर स्पीडिंग. अब इसे रोकने के लिए फास्टैग से चालान का प्रस्ताव. स्पीड अधिक हुई तो टोल पर ही होगा चालान…सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका. ये वजह बताई

एक्सप्रेसवे व हाईवेज पर स्पीड कैमरा लगने के बावजूद भी वाहनों की ओवर स्पीडिंग एक सामान्य बात है क्योंकि वाहन चालक जैसे ही कैमरा आने वाला होता है, अपनी गति को कम कर लेते हैं और चालान से बच जाते हैं। वाहन चालक ऐसा न कर सकें, इस उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी याचिका पर न्यायालय ने सुनवाई करते हुए कहा कि टोल प्लाजा पर वाहन के गुजरने के समय के आधार पर ई-चालान किये जाने की इस याचिका पर गम्भीर विचार की आवश्यकता है. सबसे पहली शुरूआत भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के साथ की जाये जिसको कि अगली नियत तिथि पर अपना शपथ पत्र दो माह में दाखिल करना होगा. यह याचिका युवा उद्यमी हेमन्त जैन द्वारा प्रस्तुत की गयी थी जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति अभय एस ओका एवं न्यायमूर्ति उज्जवल भुआन द्वारा विगत गुरूवार को की गयी थी और विषय को अधिवक्ता के0सी0 जैन द्वारा प्रस्तुत किया गया.

न्यायमित्र गौरव अग्रवाल द्वारा इस याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि एक टोल प्लाजा से दूसरे टोल प्लाजा के बीच की दूरी को फासटैग की समय की रीडिंग्स के आधार पर ओवर स्पीडिंग को रोकने के लिए किया जाना चाहिए। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बैनर्जी द्वारा याचिका का विरोध किया गया. इस पर न्यायालय ने कहा कि गति सीमा उल्लंघन के मामलों में कोई खामी या चूक नहीं रहनी चाहिए और एनएचएआई के माध्यम से इस प्रयोग पर शपथ पत्र दाखिल करना चाहिए.

याचिका में यह कहा गया कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं से हर साल डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं जिनमें से 70 प्रतिशत मौतें ओवरस्पीडिंग की वजह से होती हैं. आज की व्यवस्था में ड्राइवर कैमरों से पहले ब्रेक मार लेते हैं और फिर तेजी से भाग जाते हैं, जिससे स्पीड कैमरे भी धोखा खा जाते हैं. यदि फासटेग के जरिए टोल से टोल तक वाहन की औसत गति मापी जाए और स्पीड लिमिट से अधिक हो तो अपने-आप चालान जारी हो. इसमें एआई तकनीक के उपयोग की बात कही गई है जिससे पूरे देश में एक समान और कठोर निगरानी हो सके. यह एक सस्ता, सटीक और व्यावहारिक तरीका है जिससे सड़कें सुरक्षित होंगी और हजारों जानें हर साल बचाई जा सकेंगी. फासटैग की व्यवस्था केन्द्र सरकार के उपक्रम नेशनल हाईवेज मैनेजमेन्ट कम्पनी लिमिटेड द्वारा की जाती है.

जिला सड़क सुरक्षा समितियों की निगरानी एमआईएस से हो
याची हेमन्त जैन की दूसरी याचिका पर भी न्यायालय द्वारा सुनवाई की गयी जो कि देश भर की जिला सड़क सुरक्षा समितियों की मॉनिटरिंग के लिये मैनेजमेन्ट इनफोरमेशन सिस्टम को प्रयोग किया जाये और सारी सूचनाओं का खुलासा हो. इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बैनर्जी ने बताया कि केन्द्र सरकार द्वारा एक पोर्टल बनाया जा चुका है जिस पर जिला सड़क सुरक्षा समितियाँ अपनी रिपोर्ट व एक्सन टेकन रिपेार्ट को अपलोड़ कर सकती हैं. इस पर न्यायालय ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को दो माह का समय दिया और कहा कि वह इस पोर्टल की कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में शपथ पत्र प्रस्तुत करे और बतायें कि क्या उसके आधार पर कार्यवाही की गयी.

इस याचिका में यह बात रखी गयी है कि हर दिन भारत में सैकड़ों लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इन मौतों के पीछे सिर्फ तेज रफ्तार या लापरवाही नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की असफलता है. सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 215(3) के अन्तर्गत प्रत्येक जिले में सड़क सुरक्षा समिति बनायी है, ताकि हर जिले में सड़क सुरक्षा को लेकर जमीनी स्तर पर निगरानी हो सके। परंतु हकीकत यह है कि इन समितियों की क्रियाशीलता बहुत कम है. इस याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह सरकारों को सख्त निर्देश दे कि न केवल जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में सक्रिय किया जाए, बल्कि उनकी बैठकों, कार्यों और रिपोर्टिंग की नियमित निगरानी की जाए.

सड़क दुर्घटना पीड़ितों के इलाज के लिए बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी तय
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 162(1) में बीमा कंपनियों को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के इलाज के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, लेकिन सरकार ने आज तक इस प्रावधान को लागू करने के लिए कोई योजना नहीं बनाई है और यह योजना बनायी जानी चाहिए. इस याचिका की सुनवाई के लिये आगामी 28 अप्रैल नियत की गयी है. न्यायालय ने इससे पूर्व धारा 162(2) में गोल्डन ऑवर्स के लिये योजना बनाने के आदेश केन्द्र सरकार को दिये जा चुके हैं लेकिन वह योजना भी अभी तक लागू नहीं हो सकी है. याचिका में कहा है कि इलाज के अभाव में मर जाना एक व्यवस्था की विफलता है, और यह याचिका उसी के खिलाफ एक उम्मीद की दस्तक है.

सड़कें हों पैदल यात्रियों के लिये सुरक्षितः
याची हेमन्त जैन की अन्य महत्वपूर्ण याचिका पैदल याचियों के सम्बन्ध में थी जिसके सम्बन्ध में न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक पैदल यात्री को संविधान की अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत सुरक्षित सड़कों का संवैधानिक अधिकार है और इस याचिका की सुनवाई मई के प्रथम या द्वितीय सप्ताह में की जायेगी. याचिका में कहा गया है कि भारत में हर साल 30,000 से ज्यादा पैदल यात्री सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. ये वे लोग हैं जो सिर्फ चलने का अधिकार चाहते हैं. एक माँ जो बाजार जा रही थी, एक बच्चा जो स्कूल जा रहा था, एक बुजुर्ग जो मंदिर लौट रहा था लेकिन सड़क हादसे का शिकार बन गये. हमारे शहरों में फुटपाथ गायब हो गए हैं, और सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए बन गई हैं. इस याचिका में न्यायालय से मांग की गई है कि सभी शहरों और राजमार्गों पर पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथ बनाए जाएं, अतिक्रमण हटे, विकलांगजनों के लिए सुविधाएं दी जाएं, और सभी ड्राइवरों को जेब्रा क्रॉसिंग पर रुकना अनिवार्य हो

याची हेमन्त जैन का वक्तव्यः
उद्देश्य किसी को दोष देना नहीं, बल्कि एक ऐसा तंत्र खड़ा करना है जिसमें हर नागरिक की जान की कीमत हो. जब तक व्यवस्था की खामियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक सड़कें कब्रगाह बनती रहेंगी. फास्टैग तकनीक, सड़क सुरक्षा समितियों की निगरानी, बीमा योजना, और पैदल यात्रियों के अधिकार ये सब मिलकर एक सुरक्षित भारत की नींव रख सकते हैं. यह लड़ाई सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि जिंदगी की रक्षा की है.

वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन का वक्तव्य
यह मामला सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और शासन की जिम्मेदारी का है. जब सरकार कानून बना चुकी है तो उसे लागू करना उसकी नैतिक व संवैधानिक जिम्मेदारी है. न्यायालय से हमारा अनुरोध है कि इन याचिकाओं को आम जनता की आवाज समझकर निर्णायक दिशा दें. हमें एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें एक माँ, एक बच्चा, एक श्रमिक - सभी सुरक्षित घर लौट सकें.

Written by
Agraleaks Team

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