आगरालीक्स..आगरा में रेनबो आईवीएफ की एमडी और बांझपन विशेषज्ञ डॉ. जयदीप मल्होत्रा ने कहा—मां बनने की राह में शारीरिक बनावट और वजन बाधक…सिंगापुर में आयोजित एस्पायर के सम्मेलन में रखे विचार
बांझपन के उपचार में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) अब केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक बहस का केंद्र बन चुका है। हाल के अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि दुबले और मोटे आईवीएफ मरीज़ों को नियंत्रित ओवेरियन स्टिमुलेशन (एसओएस) के दौरान भिन्न-भिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।रेनबो आईवीएफ की एमडी एवं बांझपन विशेषज्ञ डॉक्टर जयदीप मल्होत्रा ने यह बातें सिंगापुर में आयोजित एस्पायर सम्मेलन में कही। उन्होंने बताया कि मोटे मरीज़ों में हार्मोनल असंतुलन के कारण दवाओं का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे आईवीएफ की सफलता दर प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, अत्यधिक दुबले मरीज़ों में हार्मोन डोज़ की अधिक संवेदनशीलता के चलते ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (ओएचएसएस) जैसी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में प्रत्येक मरीज़ के लिए व्यक्तिगत चिकित्सा योजना बनाना आवश्यक हो जाता है।
नैतिक सुविधाएं भी कम नहींएस्पायर की पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. मल्होत्रा ने यह भी कहा कि आईवीएफ से जुड़े कई नैतिक प्रश्न चिकित्सा समुदाय को असमंजस में डालते हैं। उदाहरण के लिए, बढ़ती उम्र की महिलाओं, अकेले अभिभावकों को उपचार प्रदान करना अब भी कई क्लीनिकों में विवाद का विषय बना हुआ है।
क्लिनिकल फर्टिलिटी प्रैक्टिस में अल्ट्रासाउंड की अहम भूमिका
इन सबके बीच, आईवीएफ प्रक्रियाओं में अल्ट्रासाउंड की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ओवेरियन स्टिमुलेशन की निगरानी, अंडाणु निकालने की प्रक्रिया और भ्रूण प्रत्यारोपण जैसे संवेदनशील चरणों में अल्ट्रासाउंड मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अनुभवी हाथों में अल्ट्रासाउंड तकनीक न केवल सफलता दर को बढ़ाती है, बल्कि संभावित जोखिमों से भी बचाती है। डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि आईवीएफ की सफलता केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि मरीज़-केंद्रित दृष्टिकोण, नैतिक संतुलन और क्लिनिकल दक्षता पर निर्भर करती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को अब इन सभी पहलुओं को मिलाकर एक समग्र और संवेदनशील उपचार पद्धति की ओर बढ़ना होगा। इस मौके पर उन्हें एस्पायर की ओर से सम्मानित किया गया।