आगरालीक्स…आगरा में श्रीमद्भागवत कथा में बताया सुदामा—श्रीकृष्ण की मित्रता का वर्णन. कहा—सच्ची मित्रता का अमर संदेश में समर्पण, संवेदना और समानता का दर्शन
सच्ची मित्रता न तो वैभव देखती है और न ही अभाव—वह केवल हृदय की पवित्रता और भाव की गहराई को पहचानती है। यही अमर संदेश कमला नगर स्थित भोले बाबा पार्क में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ की विश्राम कथा में सुदामा–श्रीकृष्ण मित्रता लीला के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। इस अंतिम कथा प्रसंग में भक्ति, करुणा और निःस्वार्थ प्रेम का ऐसा भावपूर्ण संगम देखने को मिला, जिसने समस्त पांडाल को भाव-विभोर कर दिया।कथा व्यास आचार्य ब्रजकिशोर वशिष्ठ ‘भैया जी’ ने सुदामा–श्रीकृष्ण की मित्रता का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि यह मित्रता समानता पर नहीं, बल्कि भाव की पवित्रता पर आधारित है। द्वारका के ऐश्वर्य और सुदामा की निर्धनता के बीच भी श्रीकृष्ण ने मित्र को उसी स्नेह से हृदय से लगाया, जैसे बाल्यकाल में संदीपनि आश्रम में लगाया करते थे। यह लीला इस बात का प्रमाण है कि भगवान के दरबार में धन नहीं, भावना का मूल्य होता है।
कथा में सुदामा का काँपते चरणों से द्वारका पहुँचना, संकोचवश भेंट छिपाना, श्रीकृष्ण द्वारा चरण धोकर मित्र का सम्मान करना और बिना माँगे ही सुदामा के जीवन को वैभव से भर देना—इन प्रसंगों ने श्रद्धालुओं की आँखें नम कर दीं। कथा व्यास ने समझाया कि सुदामा–कृष्ण मित्रता हमें सिखाती है कि सच्चा मित्र वही है जो अभाव में भी सम्मान देता है और बिना अपेक्षा के सब कुछ अर्पित कर देता है।