आगरालीक्स…बचपन में शौक था पिताजी जैसा बनने का, जवानी में अहसास हुआ कि ईश्वर की बराबरी नहीं होती… फादर्स डे पर महान सर्जन स्व. डॉ. अजय प्रकाश को भावभीनी श्रद्धांजलि
बचपन में जब भी कोई बेटा अपने पिता को सफेद कोट पहनकर अस्पताल जाते देखता है, तो मन में एक ही ख्वाहिश उठती है – “मुझे भी बिल्कुल पिताजी जैसा बनना है ।” उस समय लगता है कि उनसे बड़ा, उनसे अधिक सक्षम और सम्मानित कोई नहीं हो सकता। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, जिम्मेदारियां समझ में आती हैं और जीवन के संघर्षों का सामना होता है, तब एहसास होता है कि पिता जैसा बनना तो दूर, उनकी ऊंचाइयों तक पहुंचना भी आसान नहीं। तब समझ आता है कि कुछ लोग केवल पिता नहीं होते, वे अपने परिवार और समाज के लिए ईश्वर का स्वरूप होते हैं। फादर्स डे के इस विशेष अवसर पर आगरा के सुप्रसिद्ध और स्व. डॉ. अजय प्रकाश को याद करते हुए आज उनका परिवार, सहयोगी और हजारों मरीज भावुक हैं। चिकित्सा जगत में उनका नाम केवल एक सफल सर्जन के रूप में नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और मानवीय संवेदनाओं की एक मिसाल के रूप में हमेशा अमर रहेगा।
विदेश के वैभव को ठुकराकर चुना राष्ट्रप्रेम
वर्ष 1981 में डॉ. अजय प्रकाश ने अमेरिका की प्रतिष्ठित मेडिकल परीक्षा उत्तीर्ण की। उस दौर में जहां अधिकांश डॉक्टर विदेशों का रुख कर रहे थे, उन्होंने विदेश में बसने के बजाय अपनी मातृभूमि को चुना। भारत लौटकर अपने देशवासियों की सेवा करने का उनका यह निर्णय उनके गहरे राष्ट्रप्रेम और सेवा भावना का जीवंत प्रमाण था।

प्रतिभा, उपलब्धियों का सफरनामा
डॉ. अजय प्रकाश का जीवन संघर्ष, असाधारण प्रतिभा और उपलब्धियों की एक अद्भुत यात्रा रहा। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में शुरुआत से ही कीर्तिमान स्थापित किएः वर्ष 1967 (हाईस्कूल) : उत्तर प्रदेश बोर्ड में 71वीं रैंक प्राप्त की, जिसमें अंग्रेजी और गणित में विशेष योग्यता शामिल थी। इंटरमीडिएट रसायन विज्ञान में ऑनर्स के साथ प्रथम श्रेणी हासिल की।
मेडिकल शिक्षा: एमबीबीएस के दौरान चिकित्सा के विभिन्न विषयों में प्रथम स्थान प्राप्त करना उनकी आदत बन चुकी थी। उन्हें विश्वविद्यालय स्तर पर सर्वोच्च सम्मानों के साथ-साथ प्रतिष्ठित फाइजर गोल्ड मेडल और कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया।
चिकित्सा जगत में तकनीकी क्रांति के जनक
डॉ. अजय प्रकाश हमेशा समय से आगे सोचने वाले दूरदर्शी चिकित्सक थे। उत्तर भारत के चिकित्सा इतिहास में कई आधुनिक तकनीकों को पहली बार लाने का श्रेय उन्हें जाता है:
अल्ट्रासोनोग्राफी: उत्तर प्रदेश का पहला अल्ट्रासोनोग्राफी सेंटर स्थापित किया।
एडवांस्ड यूरोलॉजी: उत्तर भारत के निजी क्षेत्र में पहली बार PCNL (किडनी स्टोन के लिए) और आधुनिक RIRS तकनीक की शुरुआत की।
कीहोल सर्जरी: वर्ष 1990 में मात्र 2.5 सेंटीमीटर के छोटे से छेद से गॉलब्लैडर (पित्ताशय) की सर्जरी कर चिकित्सा जगत को हैरान कर दिया । इसके अगले ही साल (1991) उन्होंने सिंगल-होल अपेंडिक्स सर्जरी भी शुरू की।
2006 का रिकॉर्ड: उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए 23 घंटे के भीतर 85 मरीजों की सफल सर्जरी की।
मानवता की सेवा और ‘शांतिवेद’ का सपना : डॉ. अजय प्रकाश का मानना था कि चिकित्सा केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम है। उनके मार्गदर्शन में हजारों जरूरतमंदों के लिए निःशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित किए गए।
एक पिता … एक मार्गदर्शक… एक ईश्वर
बचपन में शौक था पिताजी जैसा बनने का। लगता था कि उनसे बेहतर कोई नहीं। लेकिन जवानी में समझ आया कि कुछ लोगों की बराबरी नहीं की जा सकती। तब एहसास हुआ कि पिता की तुलना किसी इंसान से नहीं, केवल ईश्वर से की जा सकती है। चिकित्सा के क्षेत्र में उनके इसी सेवाभावी विजन को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2019 में आगरा में विश्वस्तरीय सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ‘शांतिवेद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ (SVIMS) की स्थापना की गई। आज यह संस्थान अत्याधुनिक चिकित्सा सेवाओं के जरिए उनके सपनों को साकार कर रहा है।

असाधारण रिकॉर्ड: जब राष्ट्रपति कलाम ने दिया आशीर्वाद
उनकी कार्यक्षमता और मरीजों के प्रति समर्पण की मिसालें आज भी दी जाती हैं।
2003 का रिकॉर्ड – उन्होंने मात्र 16 घंटे में 62 सफल सर्जरी कर एक असाधारण कीर्तिमान रचा। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने स्वयं उन्हें फोन कर बधाई और आशीर्वाद दिया था।

स्व. डॉ. अजय प्रकाश के परिजनों की भावनाएं
आज भले ही डॉ. अजय प्रकाश भौतिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, उनकी उत्कृष्ट चिकित्सा पद्धतियां और उनकी सेवा भावना हजारों लोगों के जीवन में हमेशा जीवित रहेंगी। फादर्स डे पर इस महान चिकित्सक, मार्गदर्शक और पिता को संपूर्ण आगरा और चिकित्सा जगत की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।