आगरालीक्स..Agra News: आगरा के राजा की मंडी मार्केट में शर्तों के विपरीत 70 दुकानें बनाने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अतिक्रमण न हटाने पर अवमानना याचिका दाखिल, कमिश्नर, डीएम सहित आठ अधिकारी फंसे।
आगरा में राजा की मंडी स्थित नजूल प्लाट नंबर 2032 और 2033 को वर्ष 1940 और 1947 में नगर पालिका ने लाला धर्मचंद जैन को पटटे पर आवंटित किया था। पटटे की शतों के अनुसार, इस भूमि पर केवल निजी आवास, कार्यालय या दुकान का निर्माण किया जा सकता था। 2008 में प्रदीप जैन ने दुकानों का किराया बढ़ा दिया। दुकानदारों ने इसका विरोध किया। इसकी शिकायत की गई तो जांच में सामने आया कि दुकानों के निर्माण में सरकारी जमीन पर भी कब्जा किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी तक कार्रवाई करने के दिए थे आदेश
इस मामले में नवंबर 2025 में अमजाूत सूरी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। इस पर दो फरवरी 2026 को डीएम द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत किए गए हलफनामा में कहा गया कि सरकारी स्वामित्व की जमीन पर दुकानें बनी हैं। इस पर कोर्ट ने दो सप्ताह में 17 फरवरी तक सकराीर जमीन को मुक्त कराने के निर्देश दिए थे। इस पर 10 फरवरी को एडीएम की अध्यक्षता में गठित की गई संयुक्त समिति ने जांच की और निशान लगाए लेकिन इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के राजा की मंडी से अतिक्रमण हटाने के आदेश के 26 दिन बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर अमरजोत सूरी ने अवमानना याचिका दायर की है। इसमें मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप, डीएम अरविंद मल्लप्पा बंगारी, नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल के साथ ही प्रमुख सचिव नगर नियोजन पी गुरु प्रसाद, एडीए प्रोटोकॉल प्रशांत तिवारी, एडीएम सिविल सप्लाई अजय नारायण सिंह, एसीडीएम सदर सचिन राजपूत, सहायक अपर नगर आयुक्त श्रद्धा पांडेय को पक्षकार बनाया है।