आगरालीक्स…डीओएस एक ऐसा टूल है जो इरिटेशन को अंडरस्टेंडिंग में बदल सकता है, बदलते दौर में टीचर्स को बिहेवियर, पर्सनेलिटी और ह्यूमन रिलेशन भी पढ़ाना होगा, सेंट पैट्रिक्स स्कूल में एक रोचक वर्कशॉप
आगरा में सेंट पैट्रिक्स जूनियर हाई स्कूल में एक रोचक कार्यशाला हुई। विद्यालय ने प्रसिद्ध बिहेवियर साइंटिस्ट को आमंत्रित किया। लगभग चार घंटे चली इस कार्यशाला में शिक्षकों को व्यक्तित्व, व्यवहार और मानवीय संबंधों को समझने का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला में इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि विवाह से पहले केवल हॉरोस्कोप मिलाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व के गुणों और स्वभाव को समझना अधिक आवश्यक है। बिहेवियर साइंटिस्ट एंड लाइफ कोच डॉ. नवीन गुप्ता के अध्ययन के अनुसार अधिकांश वैवाहिक विवाद केवल टेम्परामेंट डिफरेंसेस यानी स्वभाव के अंतर के कारण उत्पन्न होते हैं, जिन्हें सही समझ और संवाद के माध्यम से आसानी से सुलझाया जा सकता है।इसी उद्देश्य से उन्होंने डीओएस यानि डिस्कवरी आफ सेल्फ नामक एक विशेष टूल विकसित किया है। यह टूल व्यक्ति को स्वयं के व्यक्तित्व के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों, सहकर्मियों, सीनियर्स और जूनियर्स के व्यवहार को समझने में सहायता करता है। यह इरिटेशन को अंडरस्टैंडिंग में बदलने का माध्यम बन सकता है।
कार्यशाला को सफल बनाने में सिस्टर लीना और सिस्टर एलिस का विशेष योगदान रहा। विद्यालय की यह पहल केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते समाज की जरूरत को समझने वाला एक सकारात्मक कदम है।
यदि देश के सभी स्कूल इसी प्रकार की जिम्मेदारी निभाएं, तो समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। टूटते रिश्तों, बढ़ते तनाव और सामाजिक असंतुलन को काफी हद तक रोका जा सकता है। नई पीढ़ी को केवल करियर नहीं, बल्कि संतुलित व्यक्तित्व और संवेदनशील सोच देना ही आज की सबसे बड़ी शिक्षा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि समाज तेजी से बदल रहा है। तकनीक, सोशल मीडिया, वैश्विक संस्कृति और बदलती जीवनशैली ने नई पीढ़ी यानी जेन जी (Gen Z) की सोच, व्यवहार और जीवन दृष्टि को पूरी तरह बदल दिया है। उनका सोचने-समझने का तरीका पहले की पीढ़ियों से काफी अलग है। यह बदलाव स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। हर दौर अपनी नई संस्कृति और नए विचार लेकर आता है। इसलिए हर सांस्कृतिक परिवर्तन को गलत कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन चिंता का विषय तब बनता है, जब कुछ युवा इस बदलाव के बीच दिशाभ्रमित हो जाते हैं और गलत कदम उठा लेते हैं। हाल ही में सामने आए सिया मर्डर केस तथा इससे पहले सोनम और मुस्कान जैसी घटनाएं समाज को झकझोरने का काम कर रही हैं। ये घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि सांस्कृतिक परिवर्तन स्वीकार्य है, परंतु उसके साथ सही दिशा और मूल्यबोध देना भी उतना ही आवश्यक है।
आज के समय में बच्चों और युवाओं में बुल्लिंग बिहेवियर, एंग्जायटी, स्ट्रेस, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा की भावना और भावनात्मक असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है। विदेशों में स्कूलों में गोलीबारी जैसी घटनाएं भी इसी मानसिक असंतुलन की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। बच्चों के भीतर बढ़ता अकेलापन, तुलना की भावना और खुद को साबित करने का दबाव उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना रहा है।
ऐसे समय में स्कूलों की भूमिका केवल शिक्षा देने तक सीमित नहीं रह गई है। अब स्कूलों को बच्चों का मार्गदर्शक, भावनात्मक सहयोगी और व्यक्तित्व निर्माता बनना होगा। प्रिंसिपल, टीचर्स और अभिभावक सभी यह समझने लगे हैं कि नई पीढ़ी को संभालना आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकता है। बच्चों को आधुनिकता की स्वीकृति के साथ-साथ सही दिशा देना भी जरूरी है, ताकि वे सांस्कृतिक बदलाव के बीच अपने मूल्यों और संतुलन को न खो दें।
इसी जागरूकता के साथ अब कई स्कूल व्यक्तित्व विकास और व्यवहार प्रशिक्षण कार्यक्रमों की ओर ध्यान दे रहे हैं। विशेषज्ञों को बुलाकर शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि वे केवल शिक्षक ही नहीं बल्कि अच्छे मेंटर और गाइड भी बन सकें।
- 1 July 2026 Agra News
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