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Agra News : “SOS” Experts in Agra Call for a Ban on the Unnecessary Use of Resources

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आगरालीक्स…सिलेंडर नहीं मिला तो एक बंद रही गरीबों की रसोई, एक्सपर्ट बोले ये सबक है, संसाधनों के गैर जरूरी उपयोग को बंद करें और बदल लें ये आदतें

आगरा में पिछले दिनों गैस सिलेंडर की किल्लत के बीच सोल्जर्स आफ समग्र सोसाइटी एसओएस की रसोई एक दिन बंद रही। अगले दिन टीम मेंबर मातादीन ने चूल्हा तैयार कर इसे दोबारा शुरू कर लिया लेकिन राजा की मंडी भोजनालय पर चलने वाली इस रसोई के संचालक और एक्सपर्ट इसे सबक बता रहे हैं। उन्होंने शहरवासियों से भी अपील की कि वे संसाधनों के गैर जरूरी उपयोग को रोक कर संकट काल में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा कुछ ऐसी आदतें हैं जिन्हें छोड़कर सहयोग प्रदान कर सकते हैं।

एसओएस के संस्थापक डॉ. नवीन गुप्ता ने कहा कि हाल के समय में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे तनावपूर्ण युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुनिया की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं पर इसका प्रभाव पड़ा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में आई अस्थिरता ने आम जनजीवन को प्रभावित किया है।

भारत में रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति में कमी ने आम नागरिकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जरूरतमंद लोगों को गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है और बढ़ी हुई कीमतों पर सिलेंडर खरीदना उनकी मजबूरी बन गई है। इसका सीधा असर उनके दैनिक जीवन और रोजगार पर पड़ रहा है। ऑटो चालक, दिहाड़ी मजदूर और छोटे कामगार—जो पहले ही सीमित आय में जीवन यापन करते हैं—अब दोहरी मार झेल रहे हैं।

इसी संदर्भ में “SOS भोजनालय” पर भी पिछले दिनों आए एक अल्पकालिक संकट को केस स्टडी माना जा सकता है। SOS भोजनालय एक सामाजिक पहल है, जिसका उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को सस्ती दरों पर भोजन उपलब्ध कराना है। यहां एक थाली की वास्तविक लागत पहले लगभग 20 रुपये थी, जिसे मात्र 10 रुपये में उपलब्ध कराया जाता था, जबकि शेष राशि स्पॉन्सर्स द्वारा वहन की जाती थी।

भोजनालय में प्रतिदिन लगभग 100 थालियां तैयार की जाती हैं, जिसके लिए प्रतिदिन 1000 रुपये की स्पॉन्सरशिप की आवश्यकता होती है और यह राशि मासिक रूप से लगभग 30,000 रुपये तक पहुँच जाती है। किंतु हाल ही में गैस की कीमतों में वृद्धि के कारण भोजन तैयार करने की प्रति थाली लागत बढ़ गई है।

स्थिति की गंभीरता का एक मार्मिक उदाहरण भोजनालय में कार्यरत रसोइया मातादीन का अनुभव है। गैस की किल्लत के कारण उन्हें पूरा दिन गैस सिलेंडर प्राप्त करने के प्रयास में बिताना पड़ा। सिलेंडर उठाने और लंबी कतारों में खड़े रहने की इस जद्दोजहद में उनका पूरा दिन निकल गया। अंततः, मजबूर होकर उन्होंने अपने घर में पारंपरिक चूल्हा बनाने में समय लगाया, ताकि किसी तरह भोजन पकाया जा सके। इस कारण उस दिन न केवल भोजनालय बंद रहा, बल्कि उनकी पूरी दिनभर की दिहाड़ी भी चली गई।

अब भोजनालय के सामने एक गंभीर दुविधा खड़ी हो गई है। यदि थाली को पहले की तरह 10 रुपये में ही उपलब्ध कराया जाए, तो प्रति थाली का अतिरिक्त भार स्पॉन्सर्स पर पड़ता है। वहीं, यदि थाली की कीमत बढ़ाकर दी जाए, तो इसका पूरा बोझ जरूरतमंद जनता पर आएगा, जो पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रही है।

संकट के समय हमारी सामाजिक जिम्मेदारी
डॉ. गुप्ता ने कहा कि ऐसे कठिन समय में केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होते, बल्कि प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिति को संभालने में अपना योगदान दे। हमें अपने व्यवहार में कुछ छोटे-छोटे बदलाव लाने होंगे। जैसे पार्टियों और दावतों को कम करना चाहिए, ताकि संसाधनों की अनावश्यक खपत को रोका जा सके। फलों और सलाद का सेवन बढ़ाना चाहिए, जिससे गैस पर निर्भरता कम हो और स्वास्थ्य भी बेहतर रहे।

देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर ने संकट के समय, विशेषकर युद्धकाल में, लोगों से एक वक्त का भोजन छोड़ने की अपील की थी। आज के इस संकट में भी हमें उस भावना को समझते हुए त्याग और संयम का परिचय देना चाहिए। यह समय हमें यह सिखाता है कि समाज में रहने के नाते हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। यदि हर व्यक्ति छोटे-छोटे प्रयास करे, तो सामूहिक रूप से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

Written by
Agraleaks Team

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