आगरालीक्स.. अब आगरा में आपरेशन से डिलीवरी हो रही है,नार्मल डिलीवरी कम होती जा रही हैं, ऐसा क्यूं हो रहा है। डिलीवरी नाॅर्मल होगी या सीजेरियन। पूरे नौ महीने तक गर्भवती महिला के घर में इसी पर चर्चा होती है। लेकिन अफसोस कि मुट्ठी भर महिलाओं को ही प्राकृतिक रूप से बच्चे के जन्म का सौभाग्य मिल पाता है। कई बार डाॅक्टरों पर आरोप लगते हैं, लेकिन इसके पीछे असल वजह कुछ और ही है। यह कहना है स्त्री रोग विशेषज्ञों का।
आगरा आॅब्स एंड गायनी सोसायटी और रेनबो हाॅस्पिटल के संयुक्त तत्वावधान में डा. आरएन गोयल स्मृति लाइव सी-सेक्शन एंड प्रिवेंशन आॅफ पीपीएच वर्कशाॅप गुरूवार को सिकंदरा स्थित रेनबो हाॅस्पिटल में आयोजित की गई। इसमें सीजेरियन डिलीवरी के जोखिम और फायदों पर चर्चा के साथ ही विशेषज्ञों ने लाइव डेंमोंस्टेशन दिए और सीजेरियन की संख्या में कमी लाने के तरीकों पर जानकारी दी। वर्कशाॅप के फाॅग्सी को-आॅर्डिनेटर डा. महेश गुप्ता ने बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य और आॅपरेशन के जरिए पैदा होने वाले बच्चों का अंतर अस्पताल में गर्भावस्था में पहुंची मां पर भी निर्भर करता है। अगर मां अस्पताल में देरी से पहुंचती है तो फिर चिकित्सकों के पास आॅपरेशन करना पहला विकल्प होता है, क्योंकि उन्हें बच्चे को बचाना होता है।
इसार और इस्पात कीं अध्यक्ष डा. जयदीप मल्होत्रा ने बताया कि महिलाओं के बीच सीजेरियन डिलीवरी का ट्रेंड हावी है। इससे जुडे़ कई मिथक हैं, जो उन्हें भटकाव में ला देते हैं। मसलन किसी व्यक्ति का यह कहना कि खामखा क्यों कष्ट सहती हो, जब सीजेरियन का विकल्प मौजूद है। एओजीएस के अध्यक्ष डा. अनुपम गुप्ता ने कहा कि हम डाॅक्टरों पर कई बार यह आरोप लगता है कि अपनी आसानी और पैसे के लिए जानबूझकर सीजेरियन डिलीवरी करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार औरतें खुद वजाइनल डिलीवरी का दर्द झेलने के लिए तैयार नहीं होतीं और हमें उनके कहने पर सीजेरियन चुनना पड़ता है। डब्ल्यूएएमपी के उपाध्यक्ष डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने कहा कि अब सीजेरियन डिलीवरी के लिए भी मानक मौजूद हैं। डब्ल्यूएचओ ने राॅब्सन क्लासीफाइड सिस्टम बनाया है, जिसके जरिए डाॅक्टर यह पता लगा लेते हैं कि किन परिस्थितियों में सीजेरियन किया जाना चाहिए। आईएमएस कीं अध्यक्ष डा. सविता त्यागी ने बताया कि कई बार तो लोग चाहते हैं कि बच्चा किसी खास दिन या खास मुहूर्त में पैदा हो। समझाने के बावजूद भी जब लोग नहीं मानते तो हमें सी-सेक्शन का रास्ता ही अपनाना होता है। इसके अलावा लड़कियों का ज्यादा उम्र में प्रसव और प्रसव से पहले पर्याप्त एक्सरसाइज न करना या शारीरिक मेहनत न करना। हमारी बदली और खराब जीवनशैली आदि तमाम वजह हैं जिनकी वजह से नाॅर्मल डिलीवरी के जरिए मां बनना मुश्किल होता है।
उत्तराखंड कीं राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के हाथों मिला सम्मान
शाम चार बजे कार्यशाला का विधिवत उद्घाटन उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने किया। कहा कि गर्भवती महिलाएं या उनके परिवार सीजेरियन डिलीवरी को फैशन न समझें। यह डॉक्टर को तय करने दें कि परिस्थितियों के अनुसार क्या सही है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने वाले चिकित्सकों को सम्मानित किया। फाॅग्सी के वर्कशाॅप को-आॅर्डिनेटर डा. महेश गुप्ता के साथ ही सेव द गर्ल चाइल्ड के लिए फाॅग्सी मिलन स्मृति अवाॅर्ड प्राप्त करने वालीं डा. निधि गुप्ता और डा. अनुपम गुप्ता, फाॅग्सी इमेजिंग साइंस अवाॅर्ड के लिए डा. मोहिता अग्रवाल, फाॅग्सी द्वारा महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में एनए पंडित एवं शैलजा एन पंडित अवाॅर्ड से सम्मानित डा. निहारिका मल्होत्रा बोरा, फाॅग्सी काॅरियन अवाॅर्ड फस्र्ट रनरअप डा. दिव्या पांडे, सन आॅफ आगरा सम्मान राजेश शर्मा को और मैं साक्षी हूं फिल्म के लिए साक्षी विद्यार्थी को उत्तराखंड कीं राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के हाथों सम्मान मिला। मंच पर उपस्थित वरिष्ठ न्यूरोसर्जन, यूरोलॉजिस्ट डॉ मधुसूदन अग्रवाल, और लीडर्स आगरा के महामंत्री सुनील जैन ने भी उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया। संचालन रेनबो हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ राजीव लोचन शर्मा ने किया।
लाइव सर्जरी, तकनीकी सत्रों में चिकित्सकों का ज्ञानवर्धन
कार्यशाला के अंतर्गत डा. महेश गुप्ता, डा. जयदीप मल्होत्रा, डा. नरेंद्र मल्होत्रा, डा. अनुपम गुप्ता, डा. सविता त्यागी, डा. शिखा सिंह, डा. रूचिका गर्ग, डा. आरती मनोज, डा. सरोज सिंह, डा. सुषमा गुप्ता, डा निधि गुप्ता, डा. रिचा सिंह, डा. बरूण सरकार, डा. संध्या अग्रवाल, डा. मनप्रीत शर्मा, डा. शैमी बंसल, डा. निहारिका मल्होत्रा, डा. नीलम माहेश्वरी, डा. शैली गुप्ता, डा. नीरजा सचवेद, डा. सरिता दीक्षित ने विभिन्न तकनीकी सत्रों और लाइव सर्जरी के जरिए चिकित्सकों का ज्ञानवर्धन किया।