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International Conference in Agra on Hindi Langauge & Literature on the world stage, Hindi Mahatari Language in foreign #agra

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आगरालीक्स…. आगरा में बोले साहित्यकार, विदेशों में हिंदी है महतारी भाषा, मार्केटिंग के लिए हिंदी सीखना जरूरी, लंदन, नीदरलैंड्स और कनाडा से एमओयू हुए।


आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषविज्ञान विद्यापीठ, कथा (यू.के.) लंदन; हिंदी वैश्विक संस्थान, नीदरलैंड्स; अखिल विश्व हिंदी समिति, कनाडा एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) के तत्वावधान में ‘विश्व पटल पर हिंदी भाषा और साहित्य’ विषय पर मंगलवार से जुबली हॉल में दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुई।
विदेशों में हिंदी महतारी भाषा
नीदरलैंड्स की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि “विदेशों में हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार विदेशों में रहने वाले हिंदी लेखकों के द्वारा ही हुआ है । भारत से बाहर रहने वाले भारतवासियों द्वारा हिंदी भाषा परिवार का विस्तार हुआ है । विदेश में रहकर हम हिंदी भाषा को महतारी भाषा के रूप में संबोधित करते हैं।” विदेश में रहकर लिखने वाले हिंदी साहित्यकारों के लेखन को प्रवासी साहित्य कहने पर उन्होंने कहा कि “साहित्य प्रवासी नहीं होता, बल्कि साहित्यकार प्रवासी होता है।
जिस तरह महाकुंभ में बड़े-बड़े आराधक पहुंचते हैं वैसे ही यहां हिंदी के साधक उपस्थित हैं।”
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता कनाडा से पधारे हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं आध्यात्मिक कवि श्री गोपाल बघेल मधु’ जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि-” आज हिंदी की आवश्यकता बहुत बढ़ गई है, विदेशों में मार्केटिंग के लिए भी हिंदी सीखना जरूरी हो गया है। कनाड़ा में हिंदी में बहुत कार्य हो रहा है लेकिन अभी इस दिशा में और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता
है ।”

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता लंदन के वरिष्ठ कथाकार श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने कहा कि -” विदेशों में हिंदी का कोई मानक पाठ्यक्रम नहीं हैं, जिसके आधार पर उन्हीं की भाषा में विदेशों में हिंदी सिखाई जा सके। भारतीय संस्थान ऐसा पाठ्यक्रम बनाएं, जिससे हिंदी को एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाया जा सके। ऐसे शिक्षक चाहिए, जो हिंदी को रशियन, फ्रेंच आदि भाषाओं में भी पढ़ा सकें ।”
रुसी राजकीय मानविकी विश्वविद्यालय रशिया से पधारी डॉ. इंदिरा गाज़िएवा ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि -“रूस और भारत में बहुत पुरानी मित्रता है। इस संगोष्ठी का उद्देश्य विश्व पटल पर हिंदी को स्थापित करना है। रूस में वहां के लोग हिंदी सीखना चाहते हैं, ताकी वह भारत आ सकें। वह भारत को जानना चाहते हैं और भारतीय संस्कृति को समझना चाहते हैं। रूस में नौ विश्वविद्यालयों में हिंदी सिखाई जाती है ।” साथ ही वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा पर उन्होंने कहा कि “हिंदी प्रेमी भी एक बड़ा परिवार हैं। ”
ओसाका विश्वविद्यालय जापान में हिंदी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मिकि निशिओका ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से अपना प्रस्तुतिकरण दिया।
ताशकंद राजकीय प्राच्य विद्या संस्थान उज़्बेकिस्तान से आई हुई प्रो. उल्फत मुहीबोवा ने कहा कि -“पूरी दुनिया में हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है, उनमें से उज्बेकिस्तान भी एक है। हमारे विश्वविद्यालय में केवल हिंदी भाषा और साहित्य को पढ़ाया ही नहीं जाता, बल्कि भारत का अर्थ, संस्कृति, भारतीय भाषा-शास्त्र पर भी काम किया जाता है औऱ भारतीय साहित्यकारों के साहित्य को भी गहराई से समझाया जाता है।”


साहित्य का संगम भारत
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशुरानी जी ने कहा –“बहुत सारी संस्कृतियों और अनेक प्रकार के साहित्य का संगम भारत रहा है। अब जब भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है, तो पूरा विश्व भारत की संस्कृति, दर्शन, भाषा, साहित्य और आदर्शों को समझना चाहता है। ऐसे में हिंदी का वर्चस्व अधिक बढ़ेगा। ”
साथ ही उन्होंन कहा कि “जैसे-जैसे हम अपनी साधना को, अपने योग को विश्व में फैला रहे हैं, वैसे-वैसे हिंदी भी आगे बढ़ रही है। ऐसे में हमें संतोषी नहीं बनना है, बल्कि और तीव्र गति से आगे बढ़ना है। हिंदी को हर हाल में जीतना चाहिए, ऐसा तभी होगा, जब हम हिंदी में लिखें, हिंदी में बोलें और हिंदी में ही सोचें। निश्चित रूप से हिंदी विश्व पटल पर छा जाएगी।”
दो पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने कहा कि
“अभी तो हम चले हैं कुछ कदम ही
तुम अगर साथ दो, तो आसमां को छू लें ”
संयोजक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने सभी मंचासीन अतिथियों का स्वागत करते हुए सौहार्दपूर्ण परिचय दिया। साथ ही संगोष्ठी के आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला- “कि इस आयोजन के माध्यम से संपूर्ण विश्व में हिंदी का परचम फहरा रहे गुणी साधकों को एकत्र कर विश्व पटल पर हिंदी को अग्रसरित करने का प्रयास किया जा रहा है।”


लंदन, नीदरलैंड्स और कनाडा से एमओयू
उद्घाटन सत्र में तीन समझौता ज्ञापनों पर भी हस्ताक्षर किए गए, जिनमें लंदन स्थित संस्कृतिक साहित्यिक संस्था यू.के. के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन, नीदरलैंड्स के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, अखिल विश्व हिंदी समिति,कनाडा के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
इस अवसर पर ‘विश्व पटल पर हिंदी भाषा और साहित्य’ विषय पर लिखी गई एक विशेष पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। इस पुस्तक में 31 आलेख संकलित हैं और इसकी विशेषता यह है,कि यह आलेख भारत से बाहर के देशों में प्रवास कर रहे वरिष्ठ साहित्यकारों,विद्वानों एवं आचार्यो द्वारा उनके देश में हिंदी की दशा और दिशा को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं।
इस अवसर पर प्रो. पूरनचंद टंडन, प्रो.सुरेंद्र दुबे तथा प्रो. सुनील बाबूराव कुलकर्णी द्वारा भी अपने विचार प्रकट किए गए। आयोजन में इंडियन बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक तरूण विश्नोई भी उपस्थित रहे।
धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ राजीव कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया।
उद्घाटन सत्र के पश्चात् गिरमिटिया मजदूरों के जीवन पर आधारित ‘कुली से कुलीन बनने का सफर’ विषय पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन भी सभी माननीय अतिथियों के द्वारा किया गया।
प्रो. उमापति दीक्षित, प्रो.नवीनचंद्र लोहानी, प्रो. शिखा श्रीधर, डॉ विवेकमणि त्रिपाठी, श्रीमती प्रगति गुप्ता, डॉ. लक्ष्मी झमन, प्रो. बीना शर्मा, श्रीमती अनिता कपूर, प्रो.अब्दुल अलीम, प्रो.बहादुर सिंह परमार, प्रो. दर्शन पांडेय, सुश्री रोसीना पास्टोरे, प्रो. प्रदीप कुमार, प्रो. हिमानी सिंह आदि विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किये ।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, छात्र-छत्राओं के अतिरिक्त विभिन्न देशों, प्रांतो, और शहरों से आये, शिक्षक, शोधार्थी एवं अन्य प्रतिभागी भी शामिल हुए।
संस्थान के शिक्षकगणों में डॉ. नीलम यादव, डॉ. रणजीत भारती, डॉ पल्लवी आर्य, डॉ. केशव शर्मा, डॉ. अमित कुमार, डॉ. शालिनी श्रीवास्तव,डॉ. राजेंद्र दवे, डॉ वर्षा रानी, डॉ. प्रदीप वर्मा, डॉ रमा, मोहिनी दयाल,डॉ आदित्य प्रकाश, डॉ. विशाल शर्मा, अनुज गर्ग,डॉ. संदीप शर्मा,कृष्ण कुमार, डॉ संदीप, अंगद, कंचन आदि उपस्थित रहे।
उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. नितिन सेठी ने किया।

Written by
Agraleaks Team

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