आगरालीक्स…डॉक्टर मरीज के लिए नहीं लिखते जेनेरिक दवाएं. ब्रांडेड दवाओं की अपेक्षा 50 से 80 प्रतिशत तक सस्ती होती है जेनेरिक दवाएं…आगरा के अधिवक्ता केसी जैन की याचिका पर 14 अप्रैल को होगी सुनवाई
08 मार्च को आठवां जन औषधि दिवस है। इसका उद्देश्य सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जन औषधि केन्द्रों पर उपलब्ध दवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। 31 दिसंबर 2025 को देश में 17990 जन औषधि केन्द्र थे जहां जेनरिक दवाऐं उपलब्ध होती हैं जो कि ब्राण्डेड दवाओं की अपेक्षा 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं लेकिन उसके उपरान्त भी मरीज जेनरिक दवाईयां नहीं खरीदता है क्योंकि चिकित्सक जेनरिक दवाओं को नहीं लिखते हैं। प्रश्न यह है कि जब कानून स्वयं चिकित्सकों को दवा जेनेरिक नाम से लिखने का है, तब देश का आम नागरिक आज भी महँगी ब्रांडेड दवाएँ खरीदने को क्यों विवश है?वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता केसी जैन द्वारा सर्वोच्च न्यायाालय में वर्ष 2023 में दायर जनहित याचिका संख्या 794/2023 इसी मूल प्रश्न को केंद्र में रखती है। यह याचिका किसी व्यक्ति या पेशे के विरुद्ध नहीं, बल्कि पहले से विद्यमान वैधानिक प्रावधानों के प्रभावी पालन की मांग है। केन्द्र सरकार, नेशनल मेडीकल काउंसिल, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथाॅरिटी (एनपीपीए) आदि पक्षकारों को न्यायालय ने नोटिस दिया है और उन्होंने अपने जवाब भी दाखिल किये हैं। अब उसकी अगली सुनवाई 14 अप्रैल को नियत है।
जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन - विधिक स्थिति और तथ्य
वर्ष 2002 में मेडीकल काउंसिल आॅफ इण्डिया (एमसीआई) द्वारा बनाए गए व्यावसायिक आचरण संबंधी रेगूलेशन्स की धारा 1.5 में स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक पंजीकृत चिकित्सक दवा जेनेरिक नाम से लिखे। 21.09.2016 को संशोधन द्वारा इस प्रावधान को और अधिक सुदृढ़ किया गया और यह अनिवार्य किया गया कि दवाएँ जेनेरिक नाम से, स्पष्ट एवं पठनीय अक्षरों में लिखी जाएँ। 25.09.2020 को नेशनल मेडीकल कमीशन अधिनियम लागू हुआ, जिसकी धाराएँ 60 और 61 के अनुसार पूर्व रेगूलेशन्स को प्रभावी बनाए रखती हैं। धारा 30 के अंतर्गत ऐसे विनियमों का उल्लंघन व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आता है। 23.08.2023 की अधिसूचना द्वारा पुनः स्पष्ट किया गया कि 2002 के रेगूलेशन्स पूर्ण रूप से लागू हैं और बाध्यकारी हैं। विधिक स्थिति निर्विवाद है - जेनेरिक नाम से दवा लिखना विकल्प नहीं, दायित्व है।
दीर्घकालिक रोगों में - जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर - यह अंतर वर्षों में लाखों रुपये तक पहुँच सकता है। जन औषधि योजना के माध्यम से नागरिकों को हजारों करोड़ रुपये की बचत का उल्लेख भी सरकारी उत्तरों में किया गया है। यह तथ्य दर्शाता है कि मूल्य का अंतर वास्तविक, मापनीय और व्यापक प्रभाव वाला है।
मानवीय आयाम - सबसे अधिक प्रभावित कौन?
दवाओं की बढ़ी हुई कीमत का सबसे अधिक बोझ निम्न वर्गों पर पड़ता है जैसे दिहाड़ी मजदूर, सीमांत किसान, वृद्ध पेंशनभोगी, विधवा महिलाएँ, ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों के परिवार
जब दवा महँगी लिखी जाती हैः
परिवार उपचार अधूरा छोड़ देता है।
मरीज आधी दवा खरीदता है।
कर्ज लेकर दवा खरीदनी पड़ती है।
स्वास्थ्य का अधिकार तब अर्थहीन हो जाता है जब वह आर्थिक रूप से वहनीय न हो। यदि सस्ती दवा उपलब्ध है और कानून भी उसका निर्देश देता है, तो उसका पालन न होना सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।
प्रवर्तन की स्थिति - संरचनात्मक कमजोरीयाचिका में यह तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि उल्लंघनों का समेकित केंद्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। नियामक संस्थाओं में रिक्त पदों की स्थिति भी दर्ज की गई है, जिससे प्रवर्तन क्षमता प्रभावित होती है। यद्यपि प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, उनका व्यापक और बाध्यकारी क्रियान्वयन नहीं दिखता। जब निगरानी और अनुशासनात्मक तंत्र सक्रिय न हो, तो वैधानिक प्रावधान व्यवहार में निष्प्रभावी हो जाते हैं।
आवश्यक सुधार - पारदर्शिता और जवाबदेही
याचिका में निम्न सुधारात्मक उपायों का सुझाव दिया गया हैः
जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन का सख्त प्रवर्तन
नियमित और संरचित प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट
स्पष्ट, पठनीय एवं क्रमशः डिजिटल पर्ची प्रणाली
दवा का जेनेरिक नाम, मात्रा और अवधि का स्पष्ट उल्लेख
नियामक संस्थाओं में रिक्त पदों की शीघ्र पूर्ति
इन उपायों से न केवल आर्थिक पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि उपचार की गुणवत्ता और विश्वसनीयता भी सुदृढ़ होगी।
के.सी. जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता: “जन औषधि दिवस सही अर्थों में जब ही बन सकेगा जब चिकित्सक जेनरिक दवाओं को लिखेंगे। जब कानून स्पष्ट रूप से यह कहता है कि दवाएँ जेनरिक नाम से लिखी जानी चाहिए और संसद में स्वीकार किया जा चुका है कि जेनेरिक दवाएँ 50 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं, तब उस व्यवस्था का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना केवल विधिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवा सेवा है, व्यापार नहीं। संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता, बल्कि सम्मानजनक और वहनीय उपचार का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। मेरा प्रयास है कि सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहले से विद्यमान कानूनों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित हो, ताकि देश का कोई भी गरीब नागरिक केवल महँगी दवा के कारण उपचार से वंचित न रह जाए।”