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IMA, Agra oppose CEA, Doctor warn, may go for strike #agranews

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आगरालीक्स..(.Agra News 6th December). आगरा में डॉक्टरों ने ​कहा हम इलाज करते हैं कारोबार नहीं, इसलिए आगरा में लागू नहीं होने देंगे सीईए, इससे मरीजों को भी नुकसान होगा। जानें डॉक्टर क्यों कर रहे विरोध।

द क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 2010 (सीईए) निजी चिकित्सकों को कारोबारी बना देगा। इलाज का खर्चा कई गुना बढ़ जाएगा। मरीजों के हित में सीईए को लागू नहीं होने देंगे। इसके लिए जरूरत पड़ी तो हड़ताल करेंगे, अस्पताल बंद कर देंगे। सोमवार को आईएमए भवन तोता का ताल पर आयोजित बैठक में सीईए के विरोध के लिए एक्शन कमेटी गठित की गई।
आइएमए, आगरा के अध्यक्ष डॉ. राजीव उपाध्याय ने बताया कि सीईए के विरोध के लिए पांच सदस्यीय एक्शन कमेटी गठित् की गई है। एक्शन कमेटी के सदस्य आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जेएन टंडन ने कहा कि राज्य सरकार चाहे तो भी सीईए लागू नहीं हो सकता है। सीईए को लागू नहीं होने दिया जाएगा। जरूरत पड़ने पर हड़ताल करेंगे, अस्पताल बंद कर देंगे। आइएमए, यूपी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुधीर धाकरे ने कहा कि सीईए लागू होने से भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा। सेल्सा के अध्यक्ष आगरा सर्जन एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्वाचित डॉ. सुनील शर्मा ने कहा कि सीईए को लागू कराकर हम अपनी आत्मा को मरने नहीं देंगे। बैठक में बड़ी संख्या में ​चिकित्सकों की सहभागिता रही। डॉ. मुनीश्वर गुप्ता, डॉ. सुनील बंसल, डॉ.जितेंद्र, डॉ. वनज माथुर, डॉ. संजय चतुर्वेदी, डॉ. प्रदीप सिंह, डॉ. संजीव बोरा, डॉ. पवन गुप्ता ,डॉक्टर समीर कुमार.

एक्शन कमेटी के सदस्य
डॉ. जेएन टंडन
डॉ. सुधीर धाकरे
डॉ. ओपी यादव
डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ
डॉ. अनूप दीक्षित

इसलिए सीईए का विरोध

  1. सीईए में वर्णित है कि इस एक्ट का एक उद्देश्य झोलाछापों पर लगाम लगाना भी है. ज्ञातव्य है कि पूरे देश में केवल उत्तर प्रदेश ही ऐसा राज्य है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पहले से ही झोलाछापों पर तथाकथित रूप से अंकुश लगाने के लिए सीएमओ द्वारा क्वालिुाइड डॉक्टर्स के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान लागू है.
  2. सेक्शन 252 के तहत जन स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी कानून को लागू करना प्रदेश सरकार की इच्छा पर निर्भर है. अभी भी दिल्ली राज्य सहित ऐसे कई राजय हैं जिन्होंने इस कानून को लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली है.
  3. सीईए में किसी भी स्तर के चिकित्सकीय संस्थान को चलाने के लिए जो न्यूनतमत आवश्यकताएं वर्णित हैं, वह पाश्चात्य विकसित देशों की नकल है, हमारे देश के लिए व्यवहारिक नहीं.
  4. इंस्पेक्टर एंड लाइसेंस राज, यानी भ्रष्टाचार को बढ़ावा.
  5. इन न्यूनतमत आवश्यकताओं को पूरा करने का इलाज का खर्च बढ़ेगा. सरकारी में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं. गरीब मरीज आखिर कहां जाएगा.
  6. केवल पड़ोसी की आपत्ति से ही संस्थान का लाइसेंस रद हो जाएगा.
  7. कंडीशन आर्फ गवर्नमेंट सेक्टर बदतर है.
  8. फिक्स्ड गाइडलाइंस (प्रोटोकॉल) फॉर ​ट्रीटमेंट और एनी डिसीस. यह मेडिकल साइंस में संभव ही नहीं है. क्योंकि यहां रोज नए अनुसंधान होते हैं, रोज इलाज की नई विधि आती है. हर मरीज का इलाज उसकी तत्कालीन स्थिति पर ओर डॉक्टर के अनुभव पर निर्भर करता है न कि किसी फिक्स्ड प्रोटोकॉल पर. इससे तो मरीज का नुकसान ही होगा.
  9. 2012 से गवर्नमेंट क्लीनिकल एस्टेबलाइसमेंट्स के लिए अलग मानक लागू हैं. मरीज तो केवल एक ही प्रजाति का है तो फिर सरकारी संस्थानों के मानक अलग क्यों? और ये मानक भी पिछले चार वर्षों में पूर्ण नहीं किए जा सके हैं. इसके अतिरिक्त इन सरकारी संस्थानों की निगरानी का उत्तरदायित्व भी उसी सरकारी तंत्र के हाथों में है, अर्थात खुद ही चोर और खुद ही कोतवाल.
  10. सीईए के तहत कोई भी सर्जन अकेले स्वामित्व में केवल अपनी ब्रांच का लेवल 2 का हॉस्पिटल नहीं चला सकता अर्थात मेजर सर्जरी नहीं कर सकता जब तक कि अन्य ब्रांच के डॉक्टर भी उस में काम न करें. मतलब पूरा कॉरपोरेट.
  11. प्रत्येक हॉस्पिटल में मेडिकल शॉप्स अनिवार्य, अर्थात मरीज की पूर्ण लूट खसोट.
  12. विभिन्न चकित्सकीय कार्यों के रेट भी निर्धारित कर दिए हैं, अर्थात् चिकित्सकीय पेशे को सरकार द्वारा ही व्यावसा​यिक कर दिया गया है आखिर गरीब मरीज कहां जाएं?
  13. सीईए को तब तक निजी क्षेत्र में लागू न किया जाए जब तक इसमें वर्णित मानक प्रदेश के समस्त सरकारी संस्थानों में वास्तव में ग्राउंड लेवल लागू एवं उपलबध न हो जाएं.
  14. तमाम पब्लिक की आपत्तियों के बावजूद आज तक कोई शराब का ठेका बंद नहीं हुआ जिसकी वजह से तमाम परिवार बर्बाद हो रहे हैं और मौतें होती हैं. नर्सिंग होम एवं क्लीनिक तो जान बचाने का काम कर रहे हैं.
  15. गंभीर मरीजों के इलाज को बाध्य किया जा रहा है, क्या उनका इलाज मशीन करेंगी? हर क्लीनिक नर्सिंग होम पर हर समय हर स्पेशलिस्ट मौजूद नहीं हो सकता न ही कॉल किया जा सकता। कोर्ट कई मामलों में निर्णय दे चुकी है कि विशेष्ज्ञज्ञ अपनी स्पेशलिटी से संबंधित मरीज का इलाज करें. दोनों बातें विरोधाभाषी हैं.
Written by
Agraleaks Team

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