आगरालीक्स…‘ईको फ्रेंड्स’ से ‘ईको फेमिनिज्म’ तक, आगरा की दो ऐसी महिलाओं के बारे में जानिए जिन्होंने घरों में खाना बना रही महिलाओं को खाद बनाने में लगा दिया, अहसास होगा कि कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के बिना नहीं हो सकता
आगरा में एक ओर जहां ऐसे लोग हैं जो किसी न किसी तरह से प्रकृति को नुकसान पहुंचाते रहते हैं, तो ऐसे लोग भी हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। दुर्भाग्य से अभी तक प्रकृति के इस तराजू का वो पलड़ा भारी है जहां इसे नुकसान पहुंचाने वाले जा बैठे हैं। प्रकृति को अपने छोटे-छोटे प्रयासों से संजोने में जुटीं इन दो महिलाओं के बारे में पढ़ने के बाद आपको तय करना पडे़गा कि आप हर साल इसी तरह जश्न मनाने के लिए 5 जून (पर्यावरण दिवस) का इंतजार करेंगे या पर्यावरण को रोजमर्रा का मुद्दा बनाएंगे।

डाॅ. मनिंदर कौर और अंजू दियालानी हो सकता है हममें से कई लोगों के लिए यह नाम नए न हों, लेकिन उनकी कोशिशें हम सभी को एक नया भविष्य देने की ओर इशारा करती हैं। उनका मानना है कि हम सभी अगर पर्यावरण के अनुकूल समाधानों को अपनाते हैं और संसाधनों की स्थिरता के उद्देश्य से इनोवेशन लाते हैं, तो पर्यावरण के संकटों को कम किया जा सकता है।
डाॅ. मनिंदर और अंजू दियालानी दोनों ही उच्च शिक्षित महिलाएं हैं और उनके मार्गदर्शन में सैकड़ों छात्र आगे बढ़ रहे हैं। वे बताती हैं कि वर्ष 2013 की बात है। हर रोज की तरह ही यह भी एक आम दिन था। वे घर में बैठी थीं लेकिन विचार खास था। वे घर से बाहर आती हैं और देखती हैं कि नजदीक ही सड़क किनारे रखे एक डस्टबिन से बाहर आकर कचरा बिखर रहा है। कोई इस पर ध्यान देने वाला नहीं है। थोड़ा आगे तक चले तो कहीं छाया नहीं मिली, क्योंकि दूर तक कोई पेड़ नहीं दिखा। और आगे चले तो प्यास भी लगने लगी, सड़क के किनारे एक हैंडपंप दिखा लेकिन उससे पानी बाहर नहीं आ रहा था। बस यहीं से उन्हें एक उद्देश्य मिला। घर वापस आकर मां से इस बारे में बात की तो मां ने बताया कि पहले ऐसा नहीं था। उनके समय में कचरे को गड्ढा खोदकर दबा दिया जाता था जिससे वो यहां-वहां न बिखरे।
डाॅ. मनिंदर और अंजू दियालानी ने कचरे को रीसाइकिल करने के बारे में और जानकारी हासिल करना शुरू कर दिया। इस बीच विदेश में रहने वाले उनके अंकल ने उन्हें चावल और गुड़ के पानी से कल्चर तैयार करने के बारे में बताया। इस कल्चर से ही घर के कचरे को खाद में बदला जा सकता है। दोनों ही महिलाओं ने इस पर काम करना शुरू किया और कल्चर और फिर खाद तैयार करना सीख लिया। धीरे-धीरे वे आगे बढ़ीं और प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। आस-पास से शुरू हुई यह कोशिश अब शहर की कई पाॅश काॅलोनियों, सोसायटी और पार्कों तक पहुंच चुकी थीं। वे वहां जातीं और लोगों को कल्चर व खाद तैयार करने का प्रशिक्षण देतीं। इस बीच उन्होंने कुछ छात्रों को साथ लेकर सड़कों, काॅलोनियों, पार्कों में सफाई अभियान भी शुरू कर दिया। इस पर लोगों ने काफी रोका-टोका, लेकिन उन्होंने अपनी कोशिशें नहीं छोड़ीं।

डाॅ. मनिंदर बताती हैं कि 02 अक्टूबर 2014 को जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जब दिल्ली में खुद झाड़ू उठाई तब शायद लोगों को पहली बार लगा कि सफाई का हमारे जीवन में क्या महत्व हो सकता है। इसके बाद यहां भी सब कुछ बदलने लगा। काफी लोग आगे आने लगे और उनके इस अभियान का हिस्सा बनने लगे। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं थीं। यह वह समय था जब आगरा की तमाम महिलाएं घर में खाना बनाते-बनाते अचानक खाद बनाने लगी थीं। डाॅ. मनिंदर और अंजू दियालानी को बदलाव का अहसास पहली बार था। उन्होंने ईको फ्रेंड्स वैलफेयर सोसायटी बनाई, जिसमें आज दर्जनों सदस्य हैं। उनकी कोशिशों को देखते हुए वर्ष 2015 में तत्कालीन नगर आयुक्त इंद्र विक्रम सिंह ने उन्हें आगरा में सफाई अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया।
अंजू दियालानी बताती हैं कि लोगों को समझाते-समझाते उन्हें यह अहसास हुआ कि लोग भाषण नहीं सुनना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने नुक्कड़ नाटकों के जरिए संदेश पहुंचाना शुरू कर दिया। सोसायटीज और पार्कों में जाकर डेमो देना शुरू किया। आगरा में पीएसबी बटालियन के उच्चाधिकारियों ने भी उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित किया और इस प्रोजेक्ट को वेस्टर्न यूपी की 14 बटालियन में शुरू करा दिया। वर्ष 2017 में एक बडे़ मीडिया समूह द्वारा आयोजित समारोह के अंतर्गत उन्हें तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ ने एक विशेष महिला सम्मान से भी नवाजा।
वर्ष 2018 में एनजी रवि कुमार जब आगरा में जिलाधिकारी रहे तो उन्होंने डीएम कंपांउंड सहित कई सरकारी विभागों में और इसके बाद डीआईजी आगरा रहे लव कुमार ने इस प्रोजेक्ट को जिला जेल में कैदियों के लिए शुरू कराया। आगरा में ही कमिश्नर रह चुके प्रदीप भटनागर और उनकी धर्मपत्नी संगीता भटनागर ने उन्हें ताज महोत्व में एक स्टाॅल उपलब्ध कराई, जहां 10 दिनों तक वर्कशाॅप की गई। वर्तमान में नगर निगम घर के कचरे से खाद बनाने के लिए कंपोस्टबिन उपलब्ध कराता है और डाॅ. मनिंदर व अंजू दियालानी लोगों को कल्चर उपलब्ध कराती हैं। इससे खाद तैयार होती है। अब तक लगभग 3000 वर्कशाॅप की जा चुकी है, 15 से 20 बडे़ कंपोस्टर शहर के पार्कों में लगाए जा चुके हैं, जिनमें काफी मात्रा में खाद बनाने की क्षमता है। नगर निगम के सहयोग से करीब 2000 कंपोस्टबिन भी घरों में खाद बनाने के लिए वितरित किए जा चुके हैं।