आगरालीक्स…शीतला पूजन (बसौडा) 9 मार्च को पूजा जाएगा. जानिए क्यों किया जाता है ठंडे भोजन से पूजन और इसके पीछे की प्रचलित कथा
यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी या लोकाचार में होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार को भी किया जाता है। शुक्रवार को भी इसके पूजन का विधान है, परंतु रविवार, शनिवार अथवा मंगलवार को शीतला का पूजन न करें। इन वारों में यदि अष्टमी तिथि पड़ जाए तो पूजन अवश्य कर लेना चाहिए। इस वर्ष सोमवार 09 मार्च के दिन शीतलापूजन (बासौड़ा) पड़ रहा है। शीतला सप्तमी पूजन 10 मार्च दिन मंगलवार को, शीतला अष्टमी पूजन बुधवार 11 मार्च को मनाया जाएगा ,इस व्रत के प्रभाव से व्रती का परिवार ज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े-फुंसियों, नेत्रों से संबंधित सभी विकार, शीतला माता की फूंसियों के चिह्न आदि रोगों तथा शीतला जनित दोषों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत के करने से शीतला देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। हर गांव, नगर तथा शहर में शीतला जी का मठ होता है। मठ में शीतला का स्वरूप भी अलग-अलग तरह का देखा जाता है। शीतलाष्टकम् में शीतला माता को रासभ (गर्दभ-गधा) के ऊपर सवार दर्शनीय रूप में वर्णित किया गया है। अतः व्रत के दिन शीतलाष्टक का पाठ करें। व्रत की विधि: शीतलाष्टमी व्रत करने वाले व्रती को पूर्व विद्धा अष्टमी तिथि ग्रहण करनी चाहिए। इस दिन सूर्योदय वेला में ठंडे पानी से स्नान कर निम्नलिखित संकल्प करना चाहिए:मम गेहे शीतला रोग जनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमीव्रतमहं करिष्ये।
इस दिन शीतला माता को भोग लगाने वाले पदार्थ मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, साग, दाल, मीठा भात, फीका भात, मौंठ, मीठा बाजरा, बाजरे की मीठी रोटी, दाल की भरवा पूड़ियां, रस, खीर आदि एक दिन पूर्व ही सायंकाल में बना लिए जाते हैं। रात्रि में ही दही जमा दिया जाता है। इसीलिए इसे बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। जिस दिन व्रत होता है उस दिन गर्म पदार्थ नहीं खाये जाते। इसी कारण घर में चूल्हा भी नहीं जलता। इस व्रत में पांचों उंगली हथेली सहित घी में डुबोकर रसोईघर की दीवार पर छापा लगाया जाता है। उस पर रोली और अक्षत चढ़ाकर शीतलामाता के गीत गाए जाते हैं। सुगंधित गंध, पुष्पादि और अन्य उपचारों से शीतला माता का पूजन कर शीतलाष्टकम् का पाठ करना चाहिए। शीतला माता की कहानी सुनें। रात्रि में दीपक जलाने चाहिए एवं जागरण करना चाहिए। बसौड़ा के दिन प्रातः एक थाली में पूर्व संध्या में तैयार नैवेद्य में से थोड़ा-थोड़ा सामान रखकर, हल्दी, धूपबत्ती, जल का पात्र, दही, चीनी, गुड़ और अन्य पूजनादि सामान सजाकर परिवार के सभी सदस्यों के हाथ से स्पर्श कराके शीतला माता के मंदिर जाकर पूजन करना चाहिए। छोटे-छोटे बालकों को साथ ले जाकर उनसे माता जी को ढोक भी दिलानी चाहिए। होली के दिन बनाई गई गूलरी (बड़कुल्ला) की माला भी शीतला मां को अर्पित करने का विधान है। चैराहे पर जल चढ़ाकर पूजा करने की परंपरा भी है। शीतला मां के पूजनोपरांत गर्दभ का भी पूजन कर मंदिर के बाहर काले श्वान (कुत्ते) के पूजन एवं गर्दभ (गधा) को चने की दाल खिलाने की परंपरा भी है। घर आकर सभी को प्रसाद एवं मोठ-बाजरा का वायना निकालकर उस पर रुपया रखकर अपनी सासूजी के चरण स्पर्श कर देने की प्रथा का भी अवश्य पालन करना चाहिए। इसके बाद किसी वृद्धा मां को भोजन कराकर और वस्त्र दक्षिणादि देकर विदा करना चाहिए। यदि घर-परिवार में शीतला माता के कुण्डारे भरने की प्रथा हो तो कुंभकार के यहां से एक बड़ा कुण्डारा तथा दस छोटे कुण्डारे मंगाकर छोटे कुण्डारों को बासी व्यंजनों से भरकर बड़े कुण्डारे में रख जलती हुई होली को दिखाए गए कच्चे सूत से लपेट कर भीगे बाजरे एवं हल्दी से पूजन करें। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य ढोक (नमस्कार) दें। पुनः सभी कुण्डारों को गीत गाते हुए शीतला माता के मंदिर में जाकर चढ़ा दें। वापसी के समय भी गीत गाते हुए आयें। पुत्र जन्म और विवाह के समय जितने कुण्डारे हमेशा भरे जाते हैं उतने और भरकर शीतला मां को चढ़ाने का विधान भी है। पूजन के लिए जाते समय नंगे पैर जाने की परंपरा है।
किसी गांव में एक बुढ़िया माई रहती थी। शीतला माता का जब बसौड़ा आता तो वह ठंडे भोजन से उनका कुण्डे भरकर पूजन करती थी और स्वयं ठंडा भोजन ही करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में आग लग गयी, जिसमें उस बुढ़िया मां की झोपड़ी को छोड़कर सभी लोगों की झोपड़ियां जल गईं, जिससे सबको बड़ा दुःख और बुढ़िया की झोपड़ी को देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। तब सब लोग उस बुढ़िया के पास आए और इसका कारण पूछा। बुढ़िया ने कहा कि मैं तो बसौडे़ के दिन शीतला माता की पूजा करके ठंडी रोटी खाती हूं, तुम लोग यह काम नहीं करते। इसी कारण मेरी झोपड़ी शीतला मां की कृपा से बच गई और तुम सबकी झोपड़ियां जल गईंं। तभी से शीतलाष्टमी (बसौड़े) के दिन पूरे गांव में शीतला माता की पूजा होने लगी तथा सभी लोग एक दिन पहले के बने हुए बासी पदार्थ (व्यंजन) ही खाने लगे। हे शीतला माता! जैसे आपने उस बुढ़िया की रक्षा की, वैसे ही सबकी रक्षा करना।
प्रचलित गीत: मेरी माता को चिनिये चैबारौ, दूध पूत देनी को चिनिये चैबारो। कौन ने मैया ईंट थपायीं, और कौन ने घोरौ है गारौ।। श्रीकृष्ण ने मैया ईंट थपायीं, दाऊजी घोरौ है गारौ। मेरी माता को चिनिये चैबारौ, दूध पूत देनी को चिनिये चैबारौ। कोरी-कोरी कुलिया मसानी दरबार, पूजन री श्री कृष्ण की सौं। कोरी कोरी कुलिया मसानी दरबार।।
गीत गाते समय क्रमशः श्रीकृष्ण और श्री दाऊजी की जगह अपने परिवार के सदस्यों के नाम भी बार-बार गावें।
बासी भोजन से ही शीतला माता की पूजा वैशाख माह के कृष्ण पक्ष के किसी भी सोमवार या किसी दूसरे शुभवार को भी करने का विधान है। वैशाख मास में इसे बूढ़ा बसौड़ा के नाम से तथा चैत्र कृष्ण पक्ष में बसौड़ा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष के दो सोमवारों और सर्दियों के किसी भी माह के दो सोमवारों को भी शीतला माता का पूजन स्त्रियों के द्वारा किया जाता है, परंतु चैत्र कृष्ण पक्ष का बसौड़ा सर्वत्र मनाया जाता है।
शीतला माता की अन्य कथायह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है।
माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी।
शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पूरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है।
तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (ज्वार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली।
तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पूजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई।
माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले।
तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इक्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़कर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये। तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है।
|| दोहा ||
जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान।
होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥
घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार।
शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥
माता शीतला स्तुतिमन्त्र
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत् पिता ।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ।।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य परम पूज्य गुरुदेव पंडित हृदय रंजन शर्मा अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार पुरानी कोतवाली सराफा बाजार अलीगढ़ यूपी व्हाट्सएप नंबर-9756402981,8272809774