आगरालीक्स…’कर्मचारी पर तनाव भारी!’ डेड लाइन, टारगेट, प्रॉफिट मार्जिन में उलझे लोग, विशेषज्ञों ने बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य से निपटने के लिए कार्यालयों के वातावरण में बदलावों की सलाह दी
आगरा में हम हर सुबह अपने वर्क प्लेस पर आते हैं, नई उम्मीदों के साथ, लेकिन क्या हमारी उम्मीदें पूरी होती हैं या फिर हम एक नया तनाव लेकर घर जाते हैं। आफिस स्ट्रेस एक साइलेंट चेलेंज है जो हमें अंदर ही अंदर जकड़ लेता है। कभी डेड लाइन का दबाव, कभी टारगेट का बोझ, कभी प्रॉफिट मार्जिन का जंजाल है तो कभी आफिस का टॉक्सिक माहौल। जाने अनजाने में ये सब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। हम भी इससे उलझ कर रह जाते हैं लेकिन क्या इस तनाव को झेलते हुए घुट घुट कर जीना चाहिए या फिर इसका सामना करना चाहिए ? इसी विषय पर हमने बात की जाने—मान बिहेवियर साइंटिस्ट एंड लाइफ कोच डॉ. नवीन गुप्ता से केस—1आगरा में एक प्राइवेट फर्म में काम करने वालीं कल्पना—बदला नाम काउंसलिंग के लिए पहुंचीं। उनका कहना था कि आफिस में वर्किंग आवर्स फिक्स नहीं हैं। चिंता ग्रोथ को लेकर भी थी। घर के काम प्रभावित हो रहे हैं। छुट्टी का मन करता है लेकिन बॉस के सामने छुट्टी का नाम लेने से भी डर लगता है।
केस—2
ऐसे ही एक दूसरे मामले में एक कॉरपोरेट कंपनी में काम करने वाले सुरेश—बदला नाम भी स्टेस में हैं और साथ ही एंग्जाइटी की समस्या है। कंपनी में अच्छे पद पर हैं लेकिन प्रबंधन से आए दिन प्रॉफिट मार्जिन को लेकर बहस होती है।
बाल नोंचने, नाखून चबाने तक के मामले
ऐसे तमाम केस हर रोज उनके पास आ रहे हैं जिनमें स्ट्रेस की वजह से लोगों को नाखून चबाते रहने और बाल नोंचने जैसी आदतें तक पड़ गई हैं। हालांकि कई बार इनके पीछे की वजह कोई पुराना हादसा भी होता है। अधिकांश मामलों में लोगों को पहचानते—पहचानते वक्त लग जाता है कि आखिर समस्या कहां है। कई लोग तो डॉक्टर्स के चक्कर लगाते रहते हैं। आराम न मिलने पर बमुश्किल ही समझ पाते हैं कि काउंसलिंग की जरूरत है।
कंपनी की लीडरशिप को करीन होगी पहल
डॉ. गुप्ता कहते हैं कि बहुत सारे एंपलायर और एंपलायी से बात करके जो जानकारी इकठ्ठा है उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि आफिस बहुत स्ट्रेसफुल हो गए हैं। वातावरण को बदलना मुश्किल हो रहा हैं। आर्गनाइजेशन के हैड्स को या लीडरशिप को ही पहल करनी पड़ेगी क्योंकि एंपलाई तो बोलता है कि मुझे प्रॉब्लम है मगर लीडरशिप अहमियत नहीं देती है। इसी से समस्या बढ़ती जाती है। दिन का ज्यादातर हिस्सा आठ से दस घंटा आप काम पर बिता रहे हैं और वो ही ठीक नहीं चल रहा है, माहौल अच्छा नहीं है तो जिंदगी खुशनुमा हो ही नहीं सकती।
तनाव बढ़ने के मुख्य कारण
अत्यधिक कार्यभार: सख्त डेडलाइन के साथ बहुत अधिक काम का दबाव।
टॉक्सिक वर्क कल्चर: सहयोग की कमी, सहकर्मियों या बॉस से खराब संबंध, और उत्पीड़न।
नौकरी की असुरक्षा: छंटनी या पुनर्गठन का लगातार डर।
काम-जीवन संतुलन की कमी: काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन न बना पाना।
नियंत्रण की कमी: काम के फैसलों में स्वायत्तता न मिलना।
तनाव के हानिकारक प्रभाव
तनाव के कारण होने वाली शारीरिक बीमारियों में हृदय रोग, अनिद्रा, सिरदर्द, और पाचन संबंधी विकार के अतिरिक्त, मानसिक स्वास्थ्य में एंग्जायटी, डिप्रेशन और साइकोसोशल जोखिम और एकाग्रता में कमी के चलते काम में गलतियां तक समस्या बन जाती है।
तनाव को कम करने के उपाय
तनाव को कम करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा जो सलाह दी जाती है उनमें काम की सीमा निर्धारित करने यानि काम के घंटे तय करने और कार्यस्थल के बाहर काम न करने। व्यायाम और ध्यान लगाने जैसे योग, मेडिटेशन और नियमित व्यायाम। संवाद अच्छा करने जैसे सहकर्मियों या मैनेजर के साथ अपनी समस्याओं को खुलकर साझा करने। काम के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक लेने, स्क्रीन से दूर रहने। और यदि तनाव अधिक या असहनीय हो तो पेशेवर काउंसलर की मदद, कई बार विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में दवाओं के साथ आगे बढ़ने की सलाह भी दी जाती है।
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