आगरालीक्स…आगरा में मानसून से पहले नाला सफाई केवल कागजी और दिखावटी साबित होती है, इसी गंभीरता की कमी से आधा शहर बारिश में डूब जाता है, अफसर चाहें तो इन जगहों पर फैक्ट चैक कर सकते हैं
आगरा में मानसून से ठीक पहले नाला सफाई अधिकांशत: केवल कागजी और दिखावटी साबित होती है। सिल्ट को निकालकर नाले के किनारे छोड़ दिया जाता है, जो बारिश में वापस अंदर चली जाती है। इसके अलावा तमाम नाले ऐसे हैं जो स्थाई तौर पर पटे हुए हैं या फिर इन पर इतने हैवी पत्थर रखे हैं जो क्रेन की मदद से ही हटाए जा सकते हैं। क्रेन कभी मंगाई जाती है तो कभी ऐसे नालों को केवल सतही तौर पर साफ करा दिया जाता है। ऐसे में यह महज एक झूठी दिलासा है कि यह नाले साफ हुए हैं। असल में यह केवल बीच—बीच से साफ कराए जाते हैं। जबकि असली चुनौती तली की सफाई है। सुल्तानगंज की पुलिया का यह सर्विस मार्ग है। हाल ही में यहां नाला सफाई कराई गई है, जो कि होनी भी चाहिए। मगर पब्लिक के कुछ सवाल हैं। क्या इस तरह की सफाई का कोई मतलब बनता है ? सम्बन्धित अधिकारी खुद यहां आकर देखें और फैक्ट चैक करें। करीब 15 दिन बाद सिल्ट तो हटवा ली गई है लेकिन नाले को बस बीच—बीच से साफ कराया गया है। हालात देखे जाएं तो इस तरह की सफाई बारिश से पहले होने वाली खानापूर्ति के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि इससे यहां जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति नहीं रूकेगी।मानसून की तैयारियों के नाम पर अक्सर शहर में छोटे—बड़े नालों की इसी तरह सतही या ऊपरी हिस्से की सफाई कर दी जाती है, जबकि भीतरी और छोटे नालों की स्थिति जस की तस बनी रहती है। बल्कि ये कहें कि इनके ऊपर रखे पत्थरों को हटाने तक की कोशिश नहीं की जाती। जबकि बिना पत्थर हटाए तला झाड़ या ढंग की सफाई नहीं हो सकती। देखा जाए तो इस तरह की सफाई में मैन पावर और पैसा दोनों लगते हैं जबकि इसका कोई मतलब नहीं है। जब जलभराव होगा तो पानी से सिर्फ साफ की गई जगह के गड्ढे ही भरेंगे पानी धाराप्रवाह होकर नाले में नहीं बहेगा क्योंकि पत्थरों के नीचे तो रूकावट है।
गौरतलब है कि सुल्तानगंज की पुलिया क्रॉसिग पर फ्लाईओवर बनने के बाद यह प्रमुख और अति व्यस्त सर्विस मार्ग है। कमला नगर, विजय नगर, गांधी नगर, न्यू आगरा, बल्केश्वर, रामबाग, भगवान टॉकीज, नेहरू नगर, विश्वविद्यालय, जीवनी मंडी की ओर से आने और जाने वाले वाहनों का इस मार्ग पर भारी दबाव रहता है। बावजूद इसके आलम यह है कि बारिश में यहां भयंकर जलभराव होता है। यातयात जस का तस थम जाता है और घुटनों तक पानी भरने के कारण वाहन घंटों जाम में फंसे रहते हैं। संभव है कि इसी दबाव में यह सफाई कराई गई हो जो सफाई कम खानापूर्ति ज्यादा लग रही है।
कंसखार, भैरों नाला, शाहगंज, ताजगंज क्षेत्र, लंगड़े की चौकी, दयालबाग, सुल्तानगंज की पुलिया आदि क्षेत्रों में अधिकारियों को फैक्ट चैक करना चाहिए। यहां स्थानीय लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि नालों के टुकड़े साफ किए जाते हैं और मुख्य बहाव रुका रहता है। क्या इस तरह की सफाई का कोई मतलब है? मानसून आने वाला है। जब तक 100 वार्डों में फैले 410 से अधिक नालों की तलीझाड़ सफाई नहीं होती, जलभराव की समस्या बनी रहेगी।