आगरालीक्स….चातुर्मास 25 जुलाई से हो रहे शुरू. शास्त्रों मे चातुर्मास में खान-पान का विशेष नियम. अगले चार महीनों में भोजन में इन चीजों का करें त्याग. सेहत के लिए भी रहेगा फायदेमंद
सनातन धर्म में सावन से कार्तिक तक के चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है। यह काल भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने का काल माना जाता है। इस दौरान सृष्टि के संचालन का भार भगवान शिव और अन्य देवताओं पर होता है। ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया की शास्त्रों के अनुसार इन चार महीनों में मनुष्य को अपने आहार-विहार पर विशेष संयम रखना चाहिए। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों में इन महीनों में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों के सेवन को पूर्ण रूप से वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि इस अवधि में किया गया संयम और व्रत-नियम न केवल पुण्यदायी होता है, बल्कि यह शरीर को भी निरोगी रखता है।क्या है चातुर्मास का नियम ?
पद्म पुराण, स्कंद पुराण और व्रतार्क ग्रंथों के अनुसार चातुर्मास में क्रमशः भोजन का त्याग करना चाहिए। इसे ही 'चातुर्मास्य व्रत' कहा जाता है।
सावन मास में साग का त्याग -
सावन माह वर्षा ऋतु का चरम होता है। इस दौरान साग-सब्जियों में कीटाणु और बैक्टीरिया की मात्रा सबसे अधिक होती है। बरसात के कारण पत्तेदार सब्जियों में छोटे-छोटे कीड़े लग जाते हैं जो पेट के रोगों का कारण बनते हैं। इसलिए सावन में साग, विशेषकर पत्तेदार साग खाने की मनाही है।
भाद्रपद मास में दही-छाछ का त्याग -
भादों के महीने में पित्त का प्रकोप बढ़ता है। ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया की आयुर्वेद के अनुसार दही-छाछ की तासीर गर्म होती है और इस मौसम में इसका सेवन करने से पित्त दोष, चर्म रोग और उदर विकार बढ़ते हैं। इसीलिए भाद्रपद में दही, छाछ और मट्ठा वर्जित माना गया है। हालांकि इस माह में तक्र का सीमित प्रयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है।
आश्विन मास में दूध का त्याग -
आश्विन मास में पितृपक्ष और नवरात्रि आते हैं। इस समय वर्षा के कारण घास में पित्त बढ़ जाता है जिसे खाने से गाय-भैंस के दूध में भी पित्त की मात्रा बढ़ जाती है। आश्विन में दूध का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और पित्तवर्धक माना जाता है। इसलिए इस माह में दूध के स्थान पर दूध से बने अन्य पदार्थ या सीमित मात्रा में सेवन की सलाह दी जाती है।
कार्तिक मास में उड़द की दाल और प्याज का त्याग -
कार्तिक माह को सबसे पवित्र महीना माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजन शर्मा के अनुसार शास्त्रों में कहा गया है - 'कार्तिके वर्जयेन्माषम्' अर्थात कार्तिक में उड़द का त्याग करना चाहिए। उड़द की दाल भारी, वातवर्धक और पचने में कठिन होती है। यह आलस्य और तमोगुण को बढ़ाती है। इसी प्रकार प्याज और लहसुन तामसिक भोजन की श्रेणी में आते हैं। कार्तिक में सात्विक जीवन और भजन-पूजन का विशेष महत्व होने से इनका सेवन वर्जित है।
तामसिक भोजन से बचें -
इन चार महीनों में किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, बैंगन, मसूर की दाल आदि से बचने की सलाह शास्त्रों में दी गई है। चातुर्मास में शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है, इसलिए हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन ही करना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक चातुर्मास के इन नियमों का पालन करता है, उसे आरोग्य, सुख-समृद्धि और विष्णु कृपा की प्राप्ति होती है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मौसम परिवर्तन के समय खान-पान में किया गया यह परहेज शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।