आगरालीक्स…. आगरा में एक तरफ कंधे पर बच्चे को बांधकर रानी झांसी ब्रिटिश फौज से मुकाबला हुआ। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास शतरंज के खिलाड़ी में वर्णित सोते हुए लखनऊ का एक पहली है। दूसरा पहलू 1857 की लड़ाई में लखनऊ के जागते किसानों, मजदूरों व गरीबों का भी है। यह कहना था वरिष्ठ रंगकर्मी अतुल तिवारी का। होटल क्लार्क शीराज में आयोजित एबीसी (आगरा बुक क्लब) की बैठक में ब्रिटिश काल के दौरान लखनऊ के नवाब वाजिद अलीशाह का जिक्र करते हे कहा कि वह अंतिम ऐसे बादशाह थे जिन्होंने किसी भी समझौते पर अंग्रेजों के साथ दस्तखत नहीं किए। बाबरी मस्जिद का किस्सा तब भी था। लेकिन तब मुस्लिम हनुमान गढ़ी को तोड़ना चाहते थे। नवाब वाजिद अलीशाह ने हनुमान गढ़ी को सुरक्षित रखा।
आगरा बुक क्लब की बैठक में 1924 में मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखे उपन्यास “शतरंज़ के खिलाड़ी” और इसी पर सत्यजीत रे की 1977 में रिलीज़ फ़िल्म पर चर्चा के साथ संपन्न हुई। सामंतवादी युग के पतन की कहानी कहती इन कृतियों पर साहित्यप्रेमियों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा की जिसमें खास ये भी कि जिस दौर में एक तरफ कंधे पर बच्चे को बांधकर रानी झांसी ब्रिटिश फौज से मुकाबला कर रही थीं और क्रांतिकारी मंगल पांडे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गदर का आगाज़ करने जा रहे थे उसी दौर में 1856 में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह ब्रिटिश हुकूमत के आगे बेबस और कायर साबित होते हैं। वजह साफ थी उस दौर का लखनऊ विलासिता में डूबे समाज और शाशन तंत्र की नुमाइंदगी कर रहा था। मिर्ज़ा और मीर सरीखे जागीरदारों के सहारे तत्कालीन समाज के उच्च वर्ग की विलासिता से समाज को हुए नुकसान की तरफ इशारा किया गया है।
दोनों जागीरदार शतरंज की बाजियों के अंत में विवाद पर तलवार निकाल कर एक दूसरे की जान तो ले लेते हैं मगर जब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों द्वारा कैद किया जा रहा था उस वक़्त वे अपना बहुमूल्य वक़्त अपने सैन्य धर्म के लिए न देकर शतरंज की बाजियों में गुजारते दिखते हैं। शतरंज के प्रति पागलपन में उनका परिवार खासतौर पर मिर्ज़ा की बीमार बीवी भी उपेक्षित हो जाती हैं। सत्यजीत रे की नवाबी दौर को जीवंत करती और कई अवार्ड प्राप्त बहुचर्चित फिल्म में खालिश उर्दू ज़बान का इस्तेमाल करते हुए कलाकारों में मुख्य पात्र वाज़िद अली शाह के किरदार को अमजद खान ने निभाया है, मिर्ज़ा के पात्र को संजीव कुमार और मीर के पात्र को सईद जाफरी ने। मिर्ज़ा की बेगम के पात्र को शबाना आज़मी और मीर की बेग़म के पात्र को फरीदा जलाल ने निभाया है। ब्रिटिश अफसर जेम्स के किरदार में रिचर्ड एटनबरो हैं तो अकील के किरदार में फारूख शेख हैं। संस्थापक डॉ. शिवानी चतुर्वेदी की अध्यक्षता में सम्पन्न इस एबीसी की बैठक में पुस्तक का परिचय अंजली कौशल ने दिया। लेखक मुंशी प्रेम चंद का परिचय पल्लवी ने दिया। उपन्यास और फ़िल्म दोनों के प्रस्तुतिकरण सहित साहित्यिक और कलात्मक पहलुओं पर प्रोफेसर वशिनी शर्मा ने चर्चा की। बैठक में बतौर पैनलिस्ट शामिल थीं वशिनी, नेहा अग्रवाल, डॉक्टर पल्लवी, अपेक्षा, डॉ. अंजली, मोनिका सिंह, डॉक्टर कृति बसंतानी आदि। मॉडरेटर नेहा और पल्लवी थीं। अंत में स्वप्ना गुप्ता ने धन्यवाद दिया। क्लब की इस बैठक में क्लब के प्रमुख सदस्यगणों में अरुण डंग, महेश धाकड़, आशुतोष विश्वकर्मा, दीपलि वेरी, डॉक्टर हिना आदि भी मौजूद थे