आगरालीक्स…. पीरियडस, यह शर्मिन्दगी नहीं उत्सव का विषय है। आगरा में मेन्सचुरेशन अक्रॉस कल्चर्स पुस्तक के विमोचन में कहा कि आज भी दक्षिण भारत में पहली बार रजोधर्म को स्त्रीत्व के आगमन के रूप में सेलीब्रेट (रितुकाल संस्कार) किया जाता है। यानि हिन्दु धर्म में रजोधर्म कोई अपराध नहीं बल्कि वो खास अवस्था है जब एक युवती मां बनने के लिए परिपक्वता की ओर बढ़ती है। लेकिन हजारो वर्ष गुलामी (मुगल व ईसाई) की जंजीरों ने भारत के इस उत्सव को भी अपराध बोध में बदल दिया। यह भारत पर राज करने वाली अन्य संस्कृतियों के मिश्रण का नतीजा था।
मैसूर के लेखक नितिन श्रीधर ने अपनी पुस्तक (Menstraution Across Cultures) विमोचन कार्यक्रम में यह जानकारी दी। इंडिक एकेडमी आगरा द्वारा आगरा ऑब्स एंड गायनी सोसायटी के सहयोग के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग ड टैक्नोलॉजी खंदारी कैम्पस में आयोजित कार्यक्रम का शुभारम्भ एसएन मेडिकल कॉलेज स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष व मुख्य अतिथि डॉ. सरोज सिंह ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप जलाकर किया। नितिन श्रीधर ने बताया कि हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि कई धर्मों में रजोधर्म की स्थिति पर शोध किया। ईसाई धर्म में एडम और ईव की मान्यता इसे सजा या पाप की मान्यता देती है। जबकि हिन्दु धर्म में यह उत्सव का विषय है। कामाख्या देवी मंदिर में प्रतिवर्ष 4 दिन का पर्व मनाया जाता है। इन दिनों मंदिर के पट बंद रहते हैं और देवी के आराम का समय होता है।
इंडिक एकेडमी आगरा के चैप्टर कॉर्डिनेटर विकास सारस्वत ने इंडिक एकेडमी के बारे में जानकारी दी। संचालन डॉ. रत्ना पांडे ने किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से विकास सारस्वत, डॉ. शिखा सिंह, सतीश अग्रवाल डॉ. बीमा शर्मा, डॉ. सुषमा सिंह, अमित जैसवाल, ठाकुर सिंह, संजीव शर्मा, सुमित भाटिया, भारत सारस्वत, विपुल बंसल, वीके सारस्वत आदि उपस्थित थे।
रजोधर्म पर खुलकर बात नहीं करती महिलाएं
डॉ. सरोज सिंह ने कहा रजोधर्म विषय पर पुस्तक का आना स्त्री रोग विशेषज्ञों के लिए खुशी की बात है। क्योंकि आज भी ज्यादातर महिलाएं इस विषय पर खुलकर बात नहीं करती। इसे पाप समझा जाता है। इसलिए अपनी समस्या को छुपाने से समस्या बढ़ जाती है। अज्ञानता और जानकारी के अभाव में जेनाइटल इनफेक्शन से बांझपन, बच्चेदानी को निकलना या महिला की मृत्यु तक हो सकती है। डॉ. अनुपम गुप्ता ने कहा कि रजोधर्म महिलाओं के लिए गौरव की बात है। इसे अपराध न समझा जाए, इसमें यह पुस्तक काफी सहयोगी होगी।
सबरीमला विवाद पर बोलते हुए नितिन श्रीधर ने कहा कि सबरीमला विवाद को बेवजह रजोधर्म से जोड़ा जा रहा है। सबरीमला मंदिर में भगवान नैष्टिका ब्रह्माचर्या (तपस्या) की स्थिति में हैं। जहां 15-50 वर्ष की महिलाओं (गर्भधारण कर सकने वाली) के प्रवेश पर रोक है, जो रजोधर्म के कारण बल्कि भगवान की ब्रह्मचर्या स्थिति में होने के कारण है। हमारे मन की तीन स्थतियां होती हैं। सात्विक, राजसी, तामसी। हिन्दू धर्म में रजोधर्म को उत्सव का विषय माना है। लेकिन इस समय मन की स्थिति राजसी होती है। जबकि मंदिरों में प्रवेश के दौरान हमारे मन की स्थिति सात्विक होनी चाहिए। इसी कारण रजोधर्म के दौरान सभी मंदिरों में महिलाएं प्रवेश नहीं करती। लेकिन सबरीमला मंदिर का विवाद रजोधर्म नहीं बल्कि ब्रह्मचर्या की स्थित से जुड़ा है।