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Agra Live News: Mechanical Thrombectomy for brain stroke patient discuss in UP UK Neuro science society Mid term conference

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आगरालीक्स…Agra News: आगरा में जुटे न्यूरोसर्जन ने कहा ब्रेन हेमरेज के मरीजों में तार डालकर निकाला जा रहा क्लॉट मस्तिष्क और सीएनएस का यह ट्यूमर कैंसर नहीं होता है लेकिन व्यवहार कैंसर की तरह से ही करता है। बच्चों में रीढ़ की हड्डी न्यूरो मॉनिटरिंग से की जा रही सीधी।
होटल जेपी पैलेस में रविवार को आयोजित यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी एवं न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी, आगरा द्वारा रविवार को होटल जेपी पैलेस में ‘भविष्य की ओर अग्रसर’ थीम पर मिड टर्म सीएमई- 2026 का भव्य आयोजन किया गया।
देश दुनिया के जाने-माने न्यूरो सर्जन, महानंदन हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा के निदेशक डॉ. आरसी मिश्रा ने ‘सीएनएस यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी एवं न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी, आगरा द्वारा रविवार को होटल जेपी पैलेस में ‘भविष्य की ओर अग्रसर’ थीम पर मिड टर्म सीएमई- 2026 का भव्य आयोजन किया गया। के प्रबंधन’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि यह ऐसा खतरनाक ट्यूमर है जो कैंसर ना होते हुए भी कैंसर की तरह व्यवहार करता है। यह ऐसी जगह पाया जाता है जहाँ से इंसान की सांस चलती है। इसकी स्थिति देखकर सर्जन के भी पसीने छूट जाते हैं। ट्यूमर का आकार, स्थान और वृद्धि दर के साथ रोगी की समग्र स्वास्थ्य स्थिति देखकर सर्जरी या रेडियो सर्जरी द्वारा इसका प्रबंधन किया जाता है। उन्होंने एसएन मेडिकल कॉलेज में पहले कैंसर के रूप में ज्वाइन करने से लेकर उस समय सीटी स्कैन और एमआरआइ की सुविधा न होने और बदलते दौर में बढ़ रहीं सुविधाओं का हवाला देते हुए न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में आ रहे बदलाव पर चर्चा की।


आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने स्वागत भाषण में कहा कि न्यूरोसर्जरी में सूक्ष्मता, धैर्य और सटीकता ही सफल परिणाम की कुंजी है। हमारा प्रयास है कि आधुनिक तकनीकों और नवीन अनुसंधानों के माध्यम से मरीजों को सुरक्षित और बेहतर उपचार उपलब्ध कराया जा सके। यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, सचिव डॉ. अरविंद कनकने, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल, सचिव डॉ. विनय अग्रवाल, सदस्य डॉ. आलोक अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता और डॉ. मयंक अग्रवाल ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर सेमिनार का शुभारंभ किया। डॉ. विनय अग्रवाल ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि हृदय रोगियों में लकवे की घटनाएँ ज्यादा होती हैं। ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने से ब्रेन हेमरेज की बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है।

अब मुंह में चीरा देकर ऑपरेशन नहीं करना पड़ता, खतरा हुआ कम
संजय गाँधी पीजीआई के विभागाध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, लखनऊ ने बताया कि खोपड़ी और रीढ़ की हड्डी जहां जुड़ती है, वहां अक्सर कुछ लोगों की हड्डी खिसक जाती है। ऐसे मरीज के लिए पहले पूरा मुँह खोलकर मुँह में चीरा देकर एक ऑपरेशन किया जाता था जो बहुत रिस्की होता था। इसमें मरीज को बहुत तकलीफ भी होती थी क्योंकि ऑपरेशन मुँह के जरिए किया जाता था। अब जो नई एंडोस्कोपिक तकनीक आई है, उसमें नाक के जरिए एंडोस्कोपी का उपयोग करके छोटा सा चीरा लगाकर दूरबीन द्वारा ऑपरेशन कर दिया जाता है। आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने सर्वाइकल स्पाइन की सर्जरी के क्षेत्र में नवीनतम तकनीकों के बारे में अपनी शोध पत्र को प्रस्तुत करते हुए बताया कि ऑपरेशन की नवीनतम विधियों द्वारा अब हाथ पैर के मारे जाने का खतरा कम हो गया है। मरीज को दर्द से आराम मिलता है। मरीज को शीघ्र ही उठाया बैठाया जा सकता है। गर्दन की हड्डी की स्लिप डिस्क का इलाज भी अब नवीनतम तकनीक से बहुत आसान हो गया है।

रीढ़ की हड्डी में टीबी पर किया गया पैनल डिस्कशन
डॉ. अरविंद कुमार अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. सुयश सिंह, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. यशपाल बुंदेला और डॉ. संतोष कुमार के एक पैनल में रीढ़ की हड्डी में टीवी पर विचार विमर्श करते हुए बताया कि यह बीमारी वैसे तो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है लेकिन युवाओं में ज्यादा देखने में आ रही है। अगर बुखार हो, कमर दर्द हो, चलने में दिक्कत हो, पैरों में झनझनाहट हो, रीढ़ की हड्डी में किसी नस पर ज्यादा दबाव महसूस करें, पैरों में कमजोरी महसूस करें तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। जांच करवाएँ और इलाज शुरू करें। अपना खान-पान अच्छा रखें। अगर कोई व्यक्ति छाती की टीबी का मरीज है तो उससे बात करते समय सावधानी बरतें, मास्क लगाएँ।

ब्रेन स्ट्रोक पर किया गया पैनल डिस्कशन
ब्रेन स्ट्रोक पर किए गए पैनल डिस्कशन में डॉ. विनय अग्रवाल, डॉ. मयंक अग्रवाल, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ के डॉ. बीके ओझा, डॉ. विकास बंसल, मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डॉ. विवेक कुमार और डॉ. अंकुर अग्रवाल ने विचार विमर्श करते हुए कहा कि ब्रेन हेमरेज में सबसे मुख्य है रक्तचाप पर नियंत्रण करना। साथ ही जिनको दिल की बीमारी है, उनके ब्रेन स्ट्रोक की रोकथाम में क्लॉट बस्टर की भूमिका महत्वपूर्ण है।

झाड़ फूंक, मालिश, सुताई और देसी इलाज है नुकसानदायक डॉ. मयंक अग्रवाल
न्यूरोसर्जन डॉ. मयंक अग्रवाल ने कहा कि आजकल खराब जीवन शैली के कारण लकवा, फालिस, हेमरेज, टीबी और नस दबी होने से परेशान मरीजों के केस बहुत आ रहे हैं। कई बार मरीज किसी विज्ञापन से प्रभावित होकर या किसी के बहकावे में आकर गलत दिशा में इलाज कराते रहते हैं। स्पाइन के पेशेंटस को मालिश करवाना, नसों को सुतवाते रहना, देसी इलाज करना या झाड़ फूंक करवाना गंभीर रूप से नुकसानदायक होता है।

ब्रेन हेमरेज के हर मरीज का ऑपरेशन करके क्लॉट निकाल देना ठीक नहीं..
'सर्जिकल मैनेजमेंट ऑफ गेंगलीओकैप्सूलर हेमरेज: करंट एविडेंस एंड कंट्रोवर्सीज' विषय पर अपने विचार साझा करते हुए अपोलो हॉस्पिटल, लखनऊ के विभागाध्यक्ष डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने कहा कि लाइफस्टाइल में परिवर्तन के कारण लोगों में ब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ रही है जिसके कारण लोगों ऐसे स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं जिनसे ब्रेन हेमरेज हो रहा है। ऐसे 100 मरीजों में से 40 मरीज अपना जीवन गँवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्व व्यापी शोध से अब ये सिद्ध हो चुका है कि ब्रेन हेमरेज के हर मरीज का ऑपरेशन करके क्लॉट निकाल देना ठीक नहीं है। जब ब्रेन हेमरेज के मरीजों में ब्रेन हेमरेज दिमाग के सरफेस तक आया हुआ होता है तब क्लॉट निकालने का फायदा मिलता है। अन्यथा की स्थिति में ब्रेन हेमरेज के लिए सबसे मुख्य कारक ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाना बेहद आवश्यक है ताकि फिर से ब्रेन हेमरेज होने पर ब्लीडिंग की संभावना न रहे।

एंडोस्कोपिक सर्जरी के रिजल्ट ओपन सर्जरी से बेहतर
डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने बताया कि ब्रेन हेमरेज के मरीज की सर्जरी में पहले बड़ा सा चीरा लगाकर बड़ी सी हड्डी हटाकर अंदर से क्लॉट निकाला जाता था और इस प्रक्रिया में ब्रेन के अंदर काफी डैमेज होता था लेकिन अब मिनिमल इनवेसिव सर्जरी यानी एंडोस्कोपिक सर्जरी के द्वारा एक छोटे से चीरे से ब्रेन के अंदर से क्लॉट निकाल दिया जाता है। इसके रिजल्ट्स भी बेहतर रहते हैं।

गर्दन की ऊपरी हड्डियों के संतुलन के लिए कारगर है सीवीजे सर्जरी
अटलांटोएक्सियल डिस्लोकेशन: क्रैनियोवर्टेब्रल जंक्शन सर्जरी में बदलते परिदृश्य' विषय पर अपने विचार साझा करते हुए डॉ. अंकुर बजाज, लखनऊ ने कहा कि क्रेनियोवर्टिब्रल जंक्शन यानी गर्दन और दिमाग के जुड़ाव वाले हिस्से की सर्जरी न्यूरोसर्जरी की सबसे जटिल सर्जरी मानी जाती है। विशेष रूप से एटलांटो-एक्सियल डिसलोकेशन ऐसी स्थिति है जिसमें गर्दन की ऊपरी हड्डियों का संतुलन बिगड़ जाता है और मरीज को गर्दन दर्द, चलने में दिक्कत, हाथ-पैरों में कमजोरी, चक्कर या गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या हो सकती है।

मैकेनिकल थ्रोम्बैकिनी से स्ट्रोक के मरीज को भी मिल जाता है सामान्य जीवन
एंडोवैस्कुलर मैनेजमेंट ऑफ स्ट्रोक: तकनीक और चुनौतियाँ' विषय पर डॉ. दीपक कुमार सिंह, लखनऊ ने कहा कि मैकेनिकल थ्रोम्बैकिनी एक ऐसी विधि है जिसमें हम स्ट्रोक के ऐसे मरीजों के लिए खून के थक्के को एक तार डालकर स्टैंट के माध्यम से निकालते हैं, जहाँ खून के थक्के का साइज बड़ा है या वह खून की बड़ी नली में है। इस विधि को अपनाने का सबसे बड़ा लाभ यह मिलता है कि लकवे के मरीज को दवा देने की जो अवधि 4:30 घंटे की होती है, उसको 6 घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। अगर एमआरआई द्वारा स्पष्ट हो जाए कि मरीज के दिमाग का काफी हिस्सा जो खतरे में है, उसको थक्का हटाकर बचाया जा सकता है तो 24 घंटे तक भी इस प्रक्रिया को अपना कर मरीज को एक सामान्य जीवन प्रदान किया जा सकता है।

न्यूरो मॉनिटरिंग से बच्चों में रीढ़ की हड्डी करते हैं सीधी
पीडियाट्रिक स्कोलियोसिस यानी बच्चों में रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाने के बारे में डॉ. अनंत मेहरोत्रा, लखनऊ ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि बच्चों के लिए यह सर्जरी काफी जटिल सर्जरी मानी जाती है। इसमें हाथ-पाँव में कमजोरी आने और मल-मूत्र की तकलीफ बढ़ जाने का खतरा रहता है। ऐसे में न्यूरो मॉनिटरिंग जैसे खास उपकरण का ऑपरेशन के दौरान प्रयोग करके इन खतरों के ना के बराबर या बहुत कम कर दिया जाता है। ऑपरेशन की सफलता की दर बढ़ जाती है। बच्चों की सर्जरी अगर जल्दी करवा दी जाए तो उतनी जल्दी रीढ़ की हड्डी सीधी होने और बच्चों की ग्रोथ नॉर्मल होने का चांस बढ़ जाता है।

हाथ पैरों में कमजोरी या सुन्नपन हो तो हो जाएँ सतर्क
स्पाइनल कॉर्ड से संबंधित विभिन्न बीमारियों के बारे में अपने विचार साझा करते हुए डॉ. अमित श्रीवास्तव, नोएडा ने बताया कि स्पाइनल कॉर्ड में सूजन या डैमेज होने से मरीज के हाथ-पैरों में कमजोरी, असंतुलन, सुन्नपन और मल-मूत्र त्यागने में दिक्कत हो जाती है। ऐसी स्थिति में मरीज को तुरंत सतर्कता बरतते हुए चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए और उसके द्वारा बताई गई जाँचों के आधार पर उपचार करवाना चाहिए।

स्ट्रोक के मरीज को मिर्गी प्रतिरोधी दवा लंबे समय तक देना लाभप्रद नहीं: डॉ. अतुल अग्रवाल
केजी मेडिकल विश्वविद्यालय, लखनऊ के भूतपूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अतुल अग्रवाल ने 'स्ट्रोक एसोसिएटेड सीजर्स' विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि स्ट्रोक के कारण बड़ी आयु में मिर्गी रोग हो जाता है। कुछ रोगियों में मिर्गी का दौरा स्ट्रोक होने के बाद ही शुरू हो जाता है जबकि अधिकतर रोगियों में यह कुछ सप्ताह या महीनों बाद होता है। इसलिए स्ट्रोक होते ही मिर्गी के दौरे से बचाव के लिए मिर्गी प्रतिरोधी दवा हफ्ते-10 दिन दी जानी चाहिए लेकिन इन दवाओं को लंबे समय तक देना लाभप्रद नहीं।


मैक्स हॉस्पिटल, दिल्ली के डॉ. सुमित सिन्हा ने स्पाइनल बोनी टयूमर्स पर विचार रखते हुए कहा कि अब स्पाइन ट्यूमर का इलाज भी नवीन पद्धति से संभव हो गया है। सेमिनार के विभिन्न सत्रों में एसआरएमएस, आइएमएस बरेली के डॉ. प्रवीण कुमार त्रिपाठी, लखनऊ से डॉ. अचल गुप्ता, फरीदाबाद से डॉ. मुकेश पांडे, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. गिरीश राजपाल, नोएडा के डॉ. नकुल पाहवा, डॉ. मृदुल शर्मा, फॉर्टिस हॉस्पिटल के डॉ. राहुल गुप्ता, डॉ. रमाकांत यादव, डॉ. अरुण सिंह, डॉ. कपिल सिंघल, डॉ. उर्वशी मीणा, यथार्थ हॉस्पिटल नोएडा के डॉ. मनीष गर्ग, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. तरुणेश शर्मा, डॉ. नीलेश गुप्ता, डॉ. राजीव बंसल, डॉ. प्रेमपाल भाटी, डॉ. गौरव धाकरे, डॉ. सजग गुप्ता, डॉ. विजयवीर सिंह, डॉ. नवनीत अग्रवाल, डॉ. एस के गुप्ता, डॉ. प्रशांत अग्रवाल, डॉ. अखिल प्रकाश शर्मा, डॉ. मुकुल पांडे, डॉ. नागेश वार्ष्णेय, डॉ. पदम चंद, डॉ. पुनीत गुप्ता, डॉ. प्रिंस अग्रवाल, डॉ. कुंज बिहारी और डॉ. आदित्य वार्ष्णेय भी प्रमुख रूप से सहभागी रहे। डॉ. मयंक बंसल, डॉ. विजयवीर और डॉ. उद्भव बंसल ने संचालन किया। क्रिस्टल प्रोजेक्ट्स के केशव गुप्ता, मनोज और योगेश द्वारा सेमिनार का कुशल प्रबंधन किया गय

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