आगरालीक्स…स्मार्ट कोशिश ही सिटी को स्मार्ट बना सकती है, आठ साल लगे डाॅ. नवीन गुप्ता इंसानों को नेक और ईमानदार बनाते रहे, आज उनके पास है ‘260 सोल्जर्स ऑफ सोसायटी’, पढ़िए एक दिलचस्प कहानी.
ईंट पत्थरों की बनी उंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, मनोरंजन और विकास के साधन तो शहर को सिर्फ सुंदर बना सकते हैं लेकिन हिन्दुस्तान इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट एंड कंप्यूटर स्टडीज (एसजीआई) के निदेशक और व्यवहार वैज्ञानिक डाॅ. नवीन गुप्ता का मत है कि स्मार्टसिटी के लिए सबसे जरूरी है कि वहां के नागरिक स्मार्ट बनें।

15 अगस्त 2014 को इस विचार के साथ कि आगरा एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक स्थल है और विभिन्न ऐतिहासिक इमारतों पर व्याप्त लपका कल्चर इस शहर की छवि को धूमिल कर रहा है, डाॅ. नवीन गुप्ता ने आगरा कैंट रेलवे स्टेशन से आॅटो चालकों के लिए प्रोजेक्ट एसओएस की शुरूआत की। आखिर क्या था यह प्रोजेक्ट ? इस सवाल के जवाब में डाॅ. गुप्ता कहते हैं कि सोल्जर्स आॅफ सोसायटी नाम की एक संस्था बनाई गई, जिसे एसओएस कहा जाता है। इस संस्था का उद्देश्य था बिना किसी शिकायत के नेकी और ईमानदारी के साथ काम करना। हमने 20 से 25 आटो रिक्शा चालकों को इकठ्ठा किया और बाहर से आने वाले पर्यटकों को लपकने यानि उनके पीछे पड़ जाने के कल्चर को खत्म करने का आग्रह किया। इसके बाद आॅटो रिक्शा चालकों की स्पेशल क्लासेज शुरू की गईं, जो पहले आगरा कैंट फिर राजा की मंडी और धीरे-धीरे विभिन्न स्थानों पर संचालित की जाने लगीं। इन क्लासेज में सिखाया जाता था कि शहर के बाहर से आने वाला हर नागरिक हमारा मेहमान है और हमें उसके साथ कैसा व्यवहार करना है। इसमें किसी का सामान खो जाने पर मदद करना, किसी बीमार को अस्पताल तक पहुंचाना, पर्यटकों से सही किराया लेकर सही स्थान तक पहुंचाना, छीना झपटी जैसी स्थिति न बनाना, तंबाकू उत्पादों का सेवन न करना, पर्यटकों से बात करने का तरीका, मदद करने का तरीका, अच्छा पहनावा, बुजुर्गों की सहायता सहित तमाम बिंदु शामिल थे। वर्ष 2014 में हुई इस शुरूआत का असर अगले एक से दो वर्षों में नजर आने लगा। हमारे आॅटो चालक लोगों की मदद करने लगे। बेहतर नतीजे सामने आने लगे। कभी कोई किसी का सामान लौटाकर आता और वापस रिपोर्ट करता तो कभी कोई किसी बीमार को अस्पताल पहुंचाकर रिपोर्ट करने लगा। इससे दूसरे लोग भी प्रेरित होने लगे। देखते ही देखते नेकी और ईमानदारी का कारवां आगे बढ़ने लगा। 25-26 लोग 50 हुए, 50 से 100 और वर्तमान में सोसाइटी के इन सोल्जर्स की संख्या 260 है। यह शहर के हर क्षेत्र में बिखरे हुए हैं और कोई भी सूचना या घटना इनसे छिप नहीं पाती। मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
तंबाकू निषेध कैंपेन चलाया, विकल्प बनाया
डाॅ. नवीन गुप्ता ने हिन्दुस्तान इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड कम्प्यूटर स्टडीज के छात्रों और एसओएस की मदद से एक तंबाकू निषेध कैंपेन की शुरूआत भी की। इसमें पहले कई आॅटो चालकों ने तंबाकू की आदत छोड़ी और फिर दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। आरबीएस काॅलेज में अर्थशास्त्र कीं प्रोफेसर डाॅ. अंजू जैन भी एसओएस के संचालन में नीतियों से जुड़ी मदद कर रही हैं। उन्होंने तंबाकू की लत छुड़ाने के लिए विकल्प नाम का एक उत्पाद भी तैयार किया।
भोजनालय बनाए, 10 रूपये में मिलती है थाली
इतना ही नहीं समाज के इन सिपाहियों के लिए राजा की मंडी रेलवे स्टेशन के बाहर एक भोजनालय की व्यवस्था भी की गई है। इस भोजनालय की भी शहर में अलग-अलग स्थानों पर कई शाखाएं हैं, जहां 10 रूपये में भर पेट भोजन कराया जाता है। भोजनालय का संचालन डाॅ. अरविंद जैन आदि प्रतिष्ठितजनों के सहयोग से किया जा रहा है।
प्रोजेक्ट रिसर्च से बदली सोच
डाॅ. गुप्ता बताते हैं कि कोरोना में जहां देश-दुनिया की सभी व्यवस्थाएं लड़खड़ा गई थीं उसमें इन आॅटो रिक्शा चालकों के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। यह कि परिवार का भरण-पोषण कैसे करें। लाॅकडाउन में सब घरों में कैद हो गए। आॅटो चालक भी और सवारियां भीं। इस बीच हमने हिन्दुस्तान इंस्टीट्यूट के छात्रों की मदद ली। प्रोजेक्ट रिसर्च बनाया। इससे आॅटो चालकों को एक ई-रिक्शा उपलब्ध कराया गया। यह प्रोजेक्ट तीन तरह से काम कर रहा था। पहला बुजुर्गों को निशुल्क घरों तक जरूरी चीजें पहुंचाना। दूसरा अकेले रहने वालों और ऐसे लोगों जिनके घर में कोई युवा नहीं है उन्हें घरों में ही राशन उपलब्ध कराना। इसके बदले किसी से कोई किराया नहीं मांगा जाता था बल्कि जो अपनी मर्जी से कुछ देना चाहे दे सकता था।