आगरालीक्स…आगरा के वो क्षेत्र बताइए जहां सही मायनों में हरियाली है. आज विश्व पर्यावरण दिवस पर जानिए आगरा के ऐसे पांच स्थानों के बारे में जिनसे बना हुआ है पर्यावरण संतुलन
आगरा में बाग भी हुआ करते थे और तालाब भी जो अब नहीं रहे। ऐसे काफी इलाके हैं जहां मकान ज्यादा हैं पेड़ कम, शाहजहां गार्डन, पालीवाल पार्क, बजीरपुरा रोड अशोक काॅसमाॅस माॅल के पास, ताज हेरिटेज काॅरीडोर साइड और माॅल रोड समेत सिर्फ पांच ही ऐसी जगह हैं जहां सही मायनों में हरियाली कही जा सकती है। यहां से गुजरने पर इसका अहसास भी होता है।

दरअसल हरियाली बढ़ाने के नाम पर हमेशा पौधारोपण होता रहता है, लेकिन बाद में इन पौधों की देखभाल न होने से यह दम तोड़ देते हैं। इसकी जगह पर्यावरण संतुलन के लिए वन क्षेत्र बढ़ाने की जरूरत है। आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद् केसी जैन ने अपनी पुस्तक स्टाॅप ताजमहल टर्निंग यलो में भी कहा है कि ताजमहल को पीला पड़ने से बचाना है तो वनावरण और निजी भूमि पर एग्रोफोरस्ट्री को बढ़ाना होगा। जब तक निजी भूमि पर वृक्ष नहीं लगेंगे तो फोरेस्ट कवर व ट्री कवर नहीं बढ़ सकते। इसके साथ-साथ नेटिव प्रजातियों को लगाए जाने और उनकी पौध तैयार करने के लिए नर्सरी बनाए जाने की जरूरत भी इस पुस्तक में बताई गई है।
पर्यावरण वैज्ञानिक, रसायन विज्ञान विभाग, दयालबाग शिक्षण संस्थान डाॅ. रंजीत कुमार कहते हैं कि यह मामला केवल ताजमहल तक ही सीमित नहीं है बल्कि हमारी और आपकी प्राणवायु से जुड़ा है। वृक्ष ही वह आॅक्सीजन छोड़ते हैं जो जीवन जीने के लिए प्राण वायु होती है। वृक्ष ही बढ़िया मानसून में मददगार साबित होते हैं। वृक्ष ही पर्यावरण और प्रकृति चक्र को सुरक्षित रखते हैं। वे कहते हैं कि आगरा में हरियाली न होने की वजह से यहां मानसून प्रभावित हुआ है। बीते कुछ वर्षों में हमने पाया कि आस-पास के इलाकों में अच्छी बारिश होती है लेकिन यहां नहीं। वहीं इस पूरे वर्ष आप एल नीनो का असर देखेंगे। अप्रैल ठंडा बीत गया और मई में जहां लू चला करती थी बारिश हो रही है। यह अनिश्चितता पूरे साल बनी रहने वाली है। दिसंबर में आप गर्मी महसूस करने वाले हैं। जनवरी भी खास ठंडी नहीं होगी।
ईको फ्रेंड्स वेलफेयर सोसायटी कीं अंजू दियालानी और डाॅ. मनिंदर कौर लम्बे समय तक शहर में हरियाली बढ़ाने के लिए काम करती आ रही हैं। वे अब तक कचरे से खाद्य बनाने के प्रशिक्षण वालीं 3000 से अधिक वर्कशाॅप भी कर चुकी हैं। 20 से 25 कंपोस्टर शहर के पार्कों में लगाए हैं। नगर निगम के सहयोग से 3000 से अधिक कंपोस्टर घरों में उपलब्ध करा चुकी हैं। वे कहती हैं कि पेड़ हमारे जीवन में कितने उपयोगी हैं यह हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं। इसके बावजूद आज तेजी से पेड़ों का काटकर कंक्रीट के जंगल बना रहे हैं। अगर ऐसा ही रहा तो यह शहर भी मरूस्थल हो जाएगा। प्राणवायु को मोहताज होंगे।