आगरालीक्स…आगरा में दिल के मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही यह तकनीक, कई मामलों में बाईपास सर्जरी टाली गई. उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल में….
देश भर में आईवस की निगरानी में इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी कुछ चुनिंदा केंद्रों में होती है, जिनमें आगरा में उजाला सिग्नस रेनबो हाॅस्पिटल का रेनबो कार्डियक केयर भी शामिल है। इस अस्पताल में अब तक कई आईवीएल हो चुकी हैं, जिनकी वजह से मरीजों को बाईपास सर्जरी नहीं करानी पड़ी हैं। हालांकि ऐसा सभी मामलों में संभव नहीं है। उजाला सिग्नस रेनबो कार्डियक केयर के निदेशक और वरिष्ठ ह्दय रोग विशेषज्ञ डा. विनीश जैन ने बताया कि हालिया मामले में मध्य आयुवर्ग के व्यक्ति को पुरानी मधुमेह, हल्की गुर्दे की समस्या और सीने में दर्द की शिकायत के साथ रेनबो कार्डियक केयर लाया गया था। एंजियोग्राफी से मरीज के ह्दय की धमनी में 90 प्रतिशत तक सिकुड़न का पता लगा। इंट्रावस्कुलर अल्ट्रासाउंड से पता लगा कि धमनी में कैल्शियम का स्तर 360 डिग्री के बराबर है। ऐसे जटिल मामलों में आम तौर पर स्पष्ट रूप से बाईपास सर्जरी की जाती है। मरीज बाईपास सर्जरी के लिए तैयार नहीं था। ऐसी स्थिति में काॅम्पलेक्स पीटीसीए की योजना बनाई गई।
आईवएस की निगरानी में इंट्रावस्कुलर लिथोट्रिप्सी आईवीएल का इस्तेमाल किया गया। यह एक प्रकार का उपकरण है जो कोरोनरी को अंदर शाॅक वेव्स देता है और जमा कैल्शियम को तोड़ देता है। यह एक क्रांतिकारी तकनीक है जो धमनियों को खोलने में मदद करती है। कई मामलों में इससे बाईपास सर्जरी को भी टाला जा सकता है। रेनबो कार्डियक केयर में अब तक ऐसे कई मामले किए जा चुके हैं और सभी सफल रहे। मरीज भी स्वस्थ हैं। उजाला सिग्नस रेनबो कार्डियक केयर आस-पास के क्षेत्र का सबसे अत्याधुनिक एक्सक्लूसिव ट्रांसरेडियल एंजियोप्लास्टी सेंटर है।

कैल्शियम जमा होने से बंद हो जाती है खून की नली
कैल्शियम जमा होने से बंद हो चुकी खून की नली को सोनिक वेब के जरिए कैल्शियम के जमाव को चूर-चूर कर उसे साफ कर एंजियोप्लास्टी के माध्यम से सफलतापूर्वक स्टंट लगाए जाते हैं। डा. विनीश ने बताया कि आम तौर पर मरीजों की ह्दय की नली बंद होने पर एंजियोप्लास्टी कर बलूनिंग और स्टेंटिंग कर खोला जाता है, लेकिन जिन मरीजों के ह्दय की नली कैल्शियम जमा होने की वजह से कठोर ब्लाॅक हो जाता है। उनमें इंट्रावस्कुलर लिथोट्रिप्सी पद्धति वरदान साबित होती है। इससे पथराई हुई नलियों को भी खोला जा सकता है।
आईवस की निगरानी में अधिक सुरक्षित
आईवस की निगरानी में इसे करने से यह और भी अधिक सुरक्षित हो जाता है। इससे ऐसे मरीजों में जिनके ह्दय की नलियों में कैल्शिफाइड ब्लाॅकेज है और उनकी बाईपास सर्जरी नहीं की जा सकती के इलाज में काफी मदद मिलती है। इस विधि से 80 से 90 फीसद उपचार प्रक्रियाओं में सफलता मिल जाती है। डा. विनीश ने बताया कि यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे आईवस की निगरानी में ही किया जाना चाहिए। आईवस इमेजिंग पद्धति के इस्तेमाल से बंद हो चुकी खून की नलियों में कैल्शियम के जमाव की सही स्थिति (वह कहां है और कितना है) का पता लगाया जा सकता है। साथ ही प्रोसीजर के साथ यह भी देखा जा सकता है कि सोनिक वेव्ब की मदद से कोरोनरी में जमा कैल्शियम को कितना हटाया जा सका है। यह धमनियों को नर्म कर देता है और स्टंट लगाने के लिए बेहतर बना देता है।