आगरालीक्स…आगरा में आज इतने बजे निकलेगा करवा चौथ का चांद…जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और चांद के निकलने का समय…
आगरा सहित पूरे देश में इस समय करवा चौथ का त्योहार मनाया जा रहा है. करवाचौथ पर सुहागिन महिलाओं ने निर्जला व्रत रखा हुआ है. रात को चांद की पूजा और जल अर्पित करते हुए व्रत को पूरा करेंगी. करवाचौथ पर महिलाएं एक जगह पर एकत्रित होकर करवा माता की पूजा और कथा सुनती हैं फिर इसके बाद सभी को चांद के निलने का इंतजार रहता है.
ज्योतिष के अनुसार आगरा में करवा चौथ की तिथि रात 9 बजकर 20 मिनट तक है. आज के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और शिव राज योग सुबह से बना हुआ है. आगरा में चंद्रोदय का समय रात 8 बजकर 30 मिनट से 40 मिनट तक है.
आज हम आपको बतायेगें,किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत
पति की लंबी आयु की कामना से पत्नियों द्वारा रखा जाने वाले करवा चौथ व्रत की महिमा अपार है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति को न केवल लंबी आयु मिलती है बल्कि वह निरोगी भी रहता है। साथ ही पति-पत्नी के बीच असीम प्रेम होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि करवा चौथ का यह व्रत सबसे पहले किसने रखा? आइए जानते है
शक्ति स्वरूपा ने रखा था सबसे पहले व्रत
मान्यता है कि सबसे पहले यह व्रत शक्ति स्वरूपा देवी पार्वती ने भोलेनाथ के लिए रखा था। इसी व्रत से उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए सुहागिनें अपने पतियों की लंबी उम्र की कामना से यह व्रत करती हैं और देवी पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं
जब सभी देवताओं की पत्नियों ने रखा यह व्रत
कथा मिलती है कि एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ा था। लाख उपायों के बावजूद भी देवताओं को सफलता नहीं मिल पा रही थी और दानव थे कि वह हावी हुए जा रहे थे। तभी ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को करवा चौथ का व्रत करने को कहा। उन्होंने बताया कि इस व्रत को करने से उनके पति दानवों से यह युद्ध जीत जाएंगे। इसके बाद कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी ने व्रत किया और अपने पतियों के लिए युद्ध में सफलता की कामना की। कहा जाता है कि तब से करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई
महाभारत में भी है करवा का प्रसंग
महाभारत काल की कथा मिलती है कि एक बार अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए थे। उसी दौरान पांडवों पर कई तरह के संक्ट आ गए। तब द्रोपदी ने श्रीकृष्ण से पांडवों के संकट से उबरने का उपाय पूछा। इसपर कन्हैया ने उन्हें कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा का व्रत करने को कहा। इसके बाद द्रोपदी ने यह व्रत किया और पांडवों को संकटों से मुक्ति मिल गई