आगरालीक्स…आगरा में बच्चे मोबाइल देखे बिना खाना नहीं खा रहे, पेरेंट्स जिद्दी और शैतान समझकर कर रहे नजरअंदाज. डॉक्टरों ने बताई वो बात, जो हर पेरेंट्स के लिए समझना जरूरी
यदि आपका बच्चा मोबाइल या टीवी देखे बिना खाना नहीं खाता, मोबाइल हटा देने पर खाना खाना छोड़ देता है तो उसे जिद्दी या शैतान समझकर नजरअंदाज न करें। यह वर्चुअल ऑटिज्म का लक्षण बी हो सकता है। भोगीपुरा स्थित आध्यात्म फाउंडेशन ऑप ऑटिज्म संस्था द्वारा आज ऑटिज्म सप्ताह के उपलक्ष्य में दो दिवसीय जागरूकता शिविर का शुभारम्भ किया गया। जिसमें 2 से 18 वर्ष तक के 30 बच्चों के अभिभावकों ने परामर्श लिया।
शिविर का शुभारम्भ विशेषज्ञों ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। सेंटर की निदेशक डॉ. रेनू तिवारी ने जानकारी देते हुए बताया कि ऑटिज्म पीड़ित बच्चों को प्रतिशत 44 तक पहुंच गया है। जिसमें जन्म से ही ऑटिज्म से पीड़ित और जन्म के बाद अधिक स्क्रीनिंग (अधिक मोबाइल और टीवी देखने से) के कारण वर्चुअल ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों का प्रतिशत बराबर है। वर्चुअल ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। शुरुआत में तो अभिभावकों को इस समस्या का पता ही नहीं चल पाता। जब बड़े होने पर भी बच्चों में सुदार नहीं होता तब वह परामर्श के लिए आते हैं। वजह बिगड़ती दिनचर्या, अभिभावकों का बच्चों को समय और ध्यान न देना, मोबाइल का अधिक प्रयोग है। जितनी तकनीक बढ़ रही है उतनी ऑटिज्म की समस्या बढ़ रही है। इसमें शब्दों, इशारों, चेहरे के भाव और स्पर्श के माध्यम से बच्चों को कुछ हद तक ठीक किया जा सकता है।
ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे मंदबुद्धि नहीं होते। यह दिमाग की एक कंडीशन है, कोई बीमारी नहीं। इस कंडीशन को हमें कैसे हैंडिल करना है और इसके साथ हम कैसे जीयें, यह ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों को बच्चों को सिखाना है। बच्चों को थैरपी, अभिभावकों को ट्रेनिंग देने के साथ समाज को जागरूक करना बेहद जरूरी है। शनिवार को शिविर सुबह 10 से दोपहर 2 बजे तक चलेगा। स्पीच लेन्गवेज पैथोलॉजिस्ट डॉ. अश्वनी श्रीवास्तव (एसएन मेडिकल कालेज), डॉ. नेहा तिवारी (लखनऊ), डॉ. प्रियंका मैसी, प्रिया श्रीवास्तव ने परामर्श दिया। इस अवसर पर मुख्य रूप से चेयरपर्सन नीरज तिवारी, पंकज तिवारी, दीक्षा, पायल, अंजली सोनी, अंजली जैन, मोनिका, लवी, छवि, नंदनी, करुणा, मुस्कान आदि उपस्थित थीं।
ये होते हैं लक्षण…
-बच्चे के नाम से पुकारने पर पलटकर न देखना।
-अन्य बच्चों के साथ मिक्स-अप न होना, अकेला खेलना।
-उत्तेजित होने पर हाथ हिलाना, कूदना या स्पनिंग जैसे एक्शन करना।
-पंजे पर चलना। जिद्दी और गुस्सैल होना। देर से बोलना।
-शोर सुनने पर अपने कानों पर हाथ रख लेना।
-किसी वस्तु के लिए अंगुली से इशारा करने के बजाय अन्य व्यक्ति के हाथों को उस ओर ले जाना।
-खिलौनों से खेलने के बजाय उन्हें लाइन से लगाते रहना या पहिया घुमाना। खिलौनों को मुंह में डालना।
-खाने पीने की वस्तुओं को प्रयोग करने से पहले सूंघना।