आगरालीक्स…आगरा में आए कुछ खास हस्तशिल्पी. कोई मोम से बना रहा बाम और फॉइल तो कोई डोकरा क्राफ्ट…
आगरा में शुक्रवार को फेयर ट्रेड फोरम इंडिया का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का हुआ समापन हो गया. इस अधिवेशन में देश के विभिन्न प्रांतों की 47 संगठनों के पदाधिकारियों ने भाग लिया. यहां कई लोग ऐसे भी आए जिनकी खूबियां ही उनको अपनी पहचान दिलाने का काम कर रही हैं.
छत्ते के मोम से बना रहे लिप बाम व इकोफ्रेन्डली फॉइल
मैथ्यू जॉन (लास्ट फारेस्ट संस्था, तमिलनाडु)
मैथ्यू जॉन ऊटी की पहाड़ियों में आदिवासी लोगों के साथ शहद निकलना व मधुमक्खी के छत्ते के मोम से साबुन, लिप बाम, इकोफ्रेन्डली फॉयल बनाने का काम कर रहे हैं। जिसकी डिमांड अब भारत में ही नहीं विदेशों में भी बढ़ रही है। मैथ्यू बताते हैं, लोग टिफिन में खाने को गरम बनाए रखने के लिए एल्यूमिनियम फॉयल का प्रयोग करते हैं। हमने मधुमक्की के छतेत के मॉम से सादा कागज का इकोफ्रेन्डली फॉयल बनाया है, जिसे लोग लगातार लगभग 50 दिन तक प्रयोग कर सकते हैं। यानि पर्यावरण को स्वच्छ रखने के साथ आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं का रोजगार भी मिल रहा है। संस्ता से 1800 लोग जुड़े हैं।
हस्तशिल्पियों के व्यापार का कर रहे हेल्थ चेकअप
नीलेश प्रियदर्शन (कारीगर क्लीनिक, गुजरात)
नीलेश गुजरात के ग्रामीण कारीगरों के व्यापार का हेल्थ चेकअप करते हैं। गांव-गांव जाकर कारीगरों से मीटिंग कर जानते हैं कि उन्हें व्यापार में किस तरह की परेशानी आ रही हैं। किसी को डिजायन, किसी को मार्केटिंग, किसी को ब्रांडिंग या फाइनेंस की परेशानी होती है। नीलेश ने ग्रामीण लोगों की न परेशानियों को दूर कर हस्तशिल्पयों के नाम से उनके पांच ब्रांड तैयार किए हैं। वह कहते हैं, हर हस्तशिल्पी के मन में व्यापार करने की इच्छा तो होती है, लेकिन व्यापार कैसे करना है इसकी जानकारी नहीं होती। हम उन्हें विजनेज हेल्थ चेकअप में इसी की सुविदा दे रहे हैं।
एक खेप तैयार करने में लगता है 15 दिन का समय
अभय कुमार साहू (अन्वेषण ड्रबल आर्ट एंड क्राफ्ट, उड़ीसा)
1200 कारीगरों के साथ मिल अभय उड़ीसा के हस्तशिल्प डोकरा क्राफ्ट को प्रोत्साहन देने का काम कर रहे हैं। मिट्टी के ऊपर तांबे के कारों से आकार देकर, उसे भट्टी में पकाकर बनाई गई विभिन्न डेकोरेटिव आयटम, ट्रेवलिंग ज्वैलरी की एक खेप तैयार करने में लगभग 15 दिन का समय लग जाता है। बताते हैं हस्तशिल्पयों को रोजगार मिलने के साथ उड़ीसा की कला को प्रोत्साहित भी मिल रहा है। बारत में ही न उत्पादों की अच्छी डिमांड है। एक कारीगर प्रतिमाह 10-12 हजार रुपए कमा रहा है।
भारतीय हस्तकला के उत्पादों की विदेशों में अधिक मांग
राजेश कुमार (आशा हैन्डीक्राफ्ट, मुम्बई)
राजेश कुमार कहते हैं भारत में चायनीज उत्पादों की सस्ते होने के कारण ज्यादा डिमांड है। जबकि हमारे भारतीय हस्तकला के उत्पादों की विदेशों में अधिक मांग है। उनकी संस्ता से देश के 16 राज्यों के लगभग 800 कारीगर जुड़े हैं। संस्ता द्वारा उन्हें ट्रेनिंग देना, कच्चा माल उपलब्ध कराना और बाजार उपलब्ध कराया जाता है। हस्तकला और लघु व कुटिर उद्योग के लिए भारत में सबसे बड़ी समस्या बेहतर बाजार का उपलब्ध न हो पाना है। हमें इसके लिए सरकार के साथ मिलकर प्रयास करने होंगे।



