आगरालीक्स… आगरा में आरएसएस के समरसता संगम के द्रश्य और पढाए गए पाठ ने दिलो दिमाग को झकझोर कर रख दिया। कई स्वयंसेवक गिर गए, उन्हें व्यवस्था में लगे स्वयंसेवकों ने संभाला।

शनिवार दोपहर दो बजे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत सुनारी में समरसता संगम कार्यक्रम में पहुंचे। यहां स्वयंसेवकों को अनेकता में एकता के अर्थ को समझाया। कहा कि दो हजार साल से शांति के लिए तमाम तरीके अपनाए गए लेकिन सफल नहीं हो पाए। युद्ध अभी तक हो रहे हैं। हिंसा भी हो रही है। ऐसे माहौल में अखिल विश्व भारत की ओर देख रहा है। तर्क दिया कि भारतीय कम सुख-सुविधाओं में भी शांति के साथ जीवन जी रहे हैं। कहा कि भारतीय संघर्ष को नहीं मानते। हम दिखते अलग हैं लेकिन हैं एक। मूल स्वरूप एक है। एकता ही विविधता है। यही विविधताएं हमारी साज-सज्जा हैं। अलग-अलग रूप हैं, रंग हैं, पहनावे हैं, भाषाएं हैं मगर एक हैं। यह सब कुछ मातृभूमि के कारण ही है। भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले ही इसे जान लिया था। इसीलिए भारतीय देश की भूमि को माता मानते हैं। इसके पीछे कारण हैं। माता के समान प्रकृति की दूसरी चीजें हमें पालती हैं। पेड़, पौधे, फलदार वृक्ष, नदी, गाय को हम मातृत्व भाव के कारण माता मानते हैं। भारतीयों की मूल अवधारण वसुधैव कुटुंबकम की रही है। इसलिए स्वमत्व वाला गौरवमयी भारत विकसित करना होगा। उन्होंने स्वयंसेवकों को संघर्ष न करने, दूसरे के धन की इच्छा न करने, ब्रह्मचर्य का पालन करने, जरूरत से अधिक धन संग्रह न करने, धन का दूसरों के लिए भी उपयोग करने का संकल्प दिलाया।

पूरी दुनिया में बुलवानी है भारत माता की जय
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि पूरी दुनियां में भारत माता की जय बुलवानी है। देश भर में संघ के स्वयंसेवक समाज से जुड़े 1.70 लाख कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। एक घंटे की शाखा में उन्हें ध्येय और संस्कार मिलते हैं। यह संदेश गांव-गांव और बस्ती-बस्ती में ले जाना है। पूरी दुनियां में भारत माता की जय बुलवाना ही संघ का लक्ष्य है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति सरकोजी ने ने महसूस किया कि भौतिक संपदा होने के बाद भी शांति नहीं है। सुख है मगर चित्त को शांति नहीं मिल रही। लिहाजा उन्होंने दुनियां भर के एक से एक बड़े अर्थशास्त्री बुला लिए। उनके साथ खूब विचार मंथन किया। तमाम फार्मूलों पर चिंतन और मनन चलता रहा। अफसोस कि कोई हल नहीं निकल पाया। फ्रांस जैसे राष्ट्र की यह हालत थी। उनका आशय था कि भारत में ऐसी स्थिति बहुत कम आई होगी। उन्होंने विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दिया। कहा कि विवेकानंद ने गुरु की परीक्षा के लिए कीलों वाले बिस्तर के बीच एक सिक्का रख दिया। जब गुरु बिस्तर पर सोने आए तो जल गया-जल गया कहकर भागे। उनकी पीठ पर सिक्के से जलने के निशान बन गए। जबकि कीलें कुछ नहीं बिगाड़ पाईं। यह देखकर स्वामी विवेकानंद चकित रह गए। हालांकि गूरू उनकी परीक्षा में सफल हो गए थे। यह हमारे इतिहास की सच्ची घटनाएं हैं।
700 साल पहले महाराष्ट्र के एक संत एकता की बात करते थे। कुछ पंडितों को यह चुभता था। लिहाजा शास्त्रार्थ की तैयारी की गई। पंडित बोले कि क्या भैंसा भी वेदपाठ कर सकता है। संत बोले क्यूं नहीं। भैसा बुलाया तो उसे संभालने को पीटा गया। संत चीखने लगे। देखा तो उनकी पीठ पर पिटाई के निशान थे। यह आध्यात्मिकता का और मानवीयता का सशक्त उदाहरण था। हालांकि यह मजह एक कहानी है।
पेड़ का उदाहरण देकर भारतीयता को रेखांकित किया। कहा कि पेड़ की जड़ अलग है। खुरदरा तना दिखाई देता है। इसके ऊपर विस्तार लिए टहनियां हैं। इनके बाद छोटी डालियां और उनमें लगे पुष्प दिखाई देते हैं। कुछ पेड़ों में फल भी उगते हैं। हालांकि ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक ही है। यही भारतीयता का उदाहरण है। हम भी ऐसे ही हैं। फूल से गिरा बीज दोबारा धरती पर जाता है। इससे फिर पेड़ बनता है। यानि जड़ एक है, बाकी सब उसकी साज-सज्जा है।