आगरालीक्स….ब्रह्म, इंद्र, रवि योग और सोमवार के दुर्लभ महायोग में पधारेंगे गजानन. भक्तों के लिए अति फलदायी. जानिए स्थापना का शुभ मुहूर्त से लेकर विसर्जन तक की पूरी जानकारी
विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का जन्मोत्सव इस बार बेहद शुभ संयोगों में मनाया जाएगा। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर इस वर्ष तीन बड़े शुभ योग – ब्रह्म योग, इंद्र योग और रवि योग का संगम बन रहा है। इसके अलावा इस दिन सोमवार भी इस दिन को और खास बना रहा है। ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी के अनुसार ऐसा महासंयोग कई वर्षों बाद बन रहा है, जो गणेश भक्तों के लिए सुख, समृद्धि और कार्यसिद्धि लेकर आएगा।
तिथि और मुहूर्त –
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026, सोमवार को मनाया जाएगा।
चतुर्थी तिथि का आरंभ 14 सितंबर को सुबह 07 बजकर 06 मिनट पर होगा और समापन 15 सितंबर को सुबह 07 बजकर 44 मिनट पर होगा। उदयातिथि के नियम के अनुसार पर्व 14 सितंबर को ही मान्य होगा। इसी दिन से 10 दिवसीय गणेशोत्सव का आरंभ होगा, जिसका समापन 25 सितंबर, शुक्रवार, अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन के साथ होगा।
गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त –
ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी ने बताया कि गणेश चतुर्थी के दिन गणपति जी की मूर्ति स्थापना और पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष रूप से शुभ माना जाता है. साल 2026 में गणपति स्थापना के लिए शुभ समय –
गणपति स्थापना का अभिजीत मुहूर्त –
दोपहर 12:09 से 12:58 बजे तक।
गणेश पूजा का शुभ समय –
सुबह 11:02 से दोपहर 01:31 बजे तक।
दोपहर में गणपति स्थापना – लाभ चौघड़िया मुहूर्त –
दोपहर 03:30 से शाम 5 बजे तक
शाम की पूजा का गोधूलि मुहूर्त –
शाम 06:42 से 07:05 बजे तक।
चार शुभ योगों का महत्व –
ब्रह्म योग: इस योग को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से जोड़ा जाता है। इस योग में की गई स्थापना से ज्ञान, बुद्धि और स्थायित्व की प्राप्ति होती है। यह योग प्रातः काल से लेकर दोपहर 12:47 तक रहेगा।
इंद्र योग: यह योग ऐश्वर्य, मान-सम्मान और शत्रु बाधा नाशक माना जाता है।
रवि योग: इस बार गणेश चतुर्थी रवि योग में बहुत ही शुभ मानी जा रही है। रवि योग में किया गया कोई भी शुभ कार्य सूर्य की तरह तेजस्वी और सफल होता है, इसमें किसी भी प्रकार के दोष का नाश होता है। यह योग दोपहर 1:55 से अगले दिन 15 सितंबर को सुबह 06:06 तक रहेगा।
सोमवार का शुभ संयोग : इस वर्ष गणेश चतुर्थी सोमवार के दिन पड़ रही है। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित होता है, जो भगवान गणेश के पिता हैं। पिता और पुत्र के इस अद्भुत संयोग से इस बार का उत्सव आध्यात्मिक रूप से बेहद शुभ और फलदायी माना जा रहा है।
इन चारों योगों के संगम में गणपति की स्थापना से रुके हुए कार्य बनेंगे और घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होगा।
गणपति स्थापना कहां और कैसे करें?
स्थान और दिशा – वास्तु के अनुसार गणेश जी की स्थापना घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में करनी चाहिए। मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें। स्थापना स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर लें। लाल या पीले रंग का नया वस्त्र चौकी पर बिछाएं।
विराजमान करने की विधि :
- सुबह स्नान कर संकल्प लें और “वक्रतुण्ड महाकाय” मंत्र का उच्चारण करें।
- मूर्ति स्थापना से पहले चौकी पर अक्षत, सुपारी और हल्दी रखें।
- गणेश जी को जल, दूर्वा और पंचामृत से स्नान कराएं। भगवान गणेश को दूर्वा और मोदक अति प्रिय हैं।
- पीले फूल, सिंदूर, पीले वस्त्र, जनेऊ, 21 दूर्वा दल अर्पित करें। महिलाएं सिंदूर की बजाय कुमकुम और फूल अर्पित करें।
- मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
घी का अखंड दीपक जलाना अति शुभ माना जाता है।
विसर्जन कब करें ?
10 दिनों तक रोज सुबह-शाम आरती और भोग की परंपरा है। जिन लोगों ने घर में गणपति स्थापित किए हैं, उन्हें इन दिनों प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा से परहेज कर सात्विक भोजन करना चाहिए। 25 सितंबर, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से पूजा कर “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के जयघोष के साथ प्रतिमा को पवित्र बहते जल में विसर्जित करें। पर्यावरण संरक्षण हेतु मिट्टी की प्रतिमा का प्रयोग करें।
विशेष सावधानी : गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन वर्जित माना गया है। भूलवश चंद्रमा दिख जाए तो “सिंहः प्रसेनमवधीत्” मंत्र का जाप करें।
ज्योतिषाचार्य पं. हृदय रंजन शर्मा जी के अनुसार, इस बार सोमवार को गणेश चतुर्थी पड़ने से शिव और गणेश दोनों का आशीर्वाद मिलेगा।