आगरालीक्स ….आज मकर संक्रांति का पुण्य पर्व कब, कैसे करें पूजा, पूरा ब्योरा.
श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान गुरु रत्न भंडार वाले ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजन शर्मा के मुताबिक मकर संक्रांति का पुण्य पर्व 14 जनवरी दिन शनिवार की रात्रि 08:43 से प्रारंभ हो रहा है, जो 15 जनवरी रविवार को दोपहर 12:45 तक विशेष पुण्य काल का समय रहेगा। मकर संक्रांति का पुण्यपर्व माना जाएगा अतः सभी इस वर्ष 14/15 जनवरी-2023 दिन शनिवार को ही मकर संक्रांति का पुण्यपर्व मनाएंगे।

मकर संक्रांति का सबसे ज्यादा महत्व
सूर्य जिस राशि पर स्थित हो, उसे छोड़कर जब दूसरी राशि में प्रवेश करे, उस समय का नाम संक्रान्ति है। सूर्य बारह स्वरूप धारण करके बारह महीनों में बारह राशियों में संक्रमण करते रहते हैं; उनके संक्रमण से ही संक्रान्ति होती है। इस तरह वर्ष में बारह संक्रान्ति होती हैं किन्तु सबसे ज्यादा महत्व मकर-संक्रान्ति का है।
देवताओं का प्रभातकाल
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना ‘मकर-संक्रान्ति’ कहलाता है। इस दिन सूर्य अपनी कक्षाओं में परिवर्तन कर दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं। उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ व दक्षिणायन को ‘देवताओं की रात’ कहा गया है। इस तरह मकर-संक्रान्ति देवताओं का प्रभातकाल है।
चेतनता और कार्य क्षमता है बढ़ती
इसको अंधकार से प्रकाश की ओर हुआ परिवर्तन माना जाता है। मकर-संक्रान्ति से दिन बढ़ने लगता हैं। रात छोटी होने लगती है। इससे प्रकाश अधिक व अंधकार कम होने लगता है। फलस्वरूप प्राणियों की चेतनता और कार्यक्षमता में वृद्धि होने लगती है।
गंगास्नान का महत्त्व
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
ऐसा माना जाता है कि मकर-संक्रान्ति के दिन गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं; इसलिए मकर-संक्रान्ति के दिन गंगास्नान या नदियों में स्नान को अत्यन्त पुण्यदायी माना गया है।
दान का फल अक्षय होता है
मकर संक्रान्ति में किए गए स्नान, तर्पण, दान और पूजन का फल अक्षय होता है। इससे मनुष्य सभी प्रकार के भोगों के साथ मोक्ष को प्राप्त होता है।
14 की संख्या में दान देने की परंपरा
उत्तरप्रदेश में इस पर्व को ‘खिचड़ी’ कहते हैं। इस दिन खिचड़ी खाना व खिचड़ी, तिल, घी, कम्बल, ऊनी वस्त्र के दान देने का विशेष महत्त्व है। शीतकाल में रुईदार वस्त्र (ऊनी वस्त्र) दान करने से शरीर में कभी दु:ख नहीं होता है। मकर-संक्रान्ति को किसी भी वस्तु का चौदह की संख्या में संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देने की परम्परा है।
पोंगल व बिहू पर्व के रूप में भी हैं मनाते
दक्षिण भारत में यह ‘पोंगल, और असम में ‘बिहू’ के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में मकर-संक्रान्तिपर्व ‘लोहिड़ी’ के नाम से मनाया जाता है।
एक लोक कथा है कि मकर-संक्रान्ति के दिन कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामकी राक्षसी को गोकुल भेजा था पर श्रीकृष्ण ने उसे खेल-खेल में ही मार डाला। इसी संदर्भ में लोहिड़ी का पर्व मनाया जाता है। साथ ही नयी फसल का चावल, दाल, तिल आदि से पूजा करके कृषिदेवता के प्रति आभार प्रकट किया जाता है।
क्रान्तिकाल में ऐसे करें भगवान सूर्य का पूजन
संक्रान्ति के दिन प्रात:स्नान करके स्नान-दान-जप-होम आदि से पहले इस प्रकार संकल्प कर लें—