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Over 1 million motor accident compensation cases are pending across the country

आगरालीक्स…देशभर में 10 लाख से अधिक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले लंबित. पीड़ित परिवार सालों से न्याय और मुआवजे का इंतजार. सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

भारत में सड़क दुर्घटना केवल एक “आंकड़ा” नहीं होती। वह किसी परिवार के लिए बेटे, पति, पिता या कमाने वाले सदस्य का अचानक खो जाना होती है। किसी के लिए जीवन भर की अपंगता, इलाज का बोझ और रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष। ऐसे पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) से मिलने वाला मुआवजा ही एकमात्र सहारा होता है। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि मुआवजा पाने की यह प्रक्रिया खुद एक लंबी, थकाऊ और पीड़ादायक लड़ाई बन चुकी है।

इसी गंभीर और मानवीय संकट को सामने रखते हुए दिनांक 27 जनवरी 2026 को एक प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट सड़क सुरक्षा समिति, नई दिल्ली को वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन द्वारा भेजा गया है, जिसमें देश-भर में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की वास्तविक स्थिति, उनकी लंबितता, वसूली की समस्याएँ और व्यावहारिक समाधान रखे गए हैं। इसकी प्रति सचिव, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को भी भेजी गई है, ताकि नीतिगत, प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर तत्काल कदम उठाए जा सकें।

आधिकारिक आँकड़े जो व्यवस्था की विफलता उजागर करते हैं
वित्तीय सेवा विभाग द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक देश में 10,34,712 मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले लंबित हैं।
लंबित मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की स्थिति (देश-भर में)

लंबित मामले की अवधि मामलों की संख्या कुल मामलों का प्रतिशत
लंबित मामले की अवधि मामलों की संख्या कुल मामलों का प्रतिशत
1 वर्ष से कम 3,42,812 33.13%
1 से 2 वर्ष 2,10,771 20.36%
2 से 3 वर्ष 1,34,886 13.03%
3 से 5 वर्ष 1,28,855 12.45%
5 वर्ष से अधिक 2,17,388 21.03%
कुल 10,34,712 100%

लगभग 46.5 प्रतिशत मामले दो वर्ष से अधिक समय से और 21 प्रतिशत से अधिक मामले पाँच वर्ष से भी अधिक समय से लंबित हैं। जिस मुआवजे का उद्देश्य तुरंत राहत देना था, वह आज सालों के इंतजार में बदल चुका है।

जब मुआवजा आदेश भी पीड़ित तक नहीं पहुँचता
कई मामलों में न्यायाधिकरण मुआवजा तय कर देता है, लेकिन वाहन बीमित नहीं होता, या तकनीकी कारणों से बीमा कंपनी को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाता है तो मुआवजा निजी वाहन मालिक से वसूलना पड़ता है। यहीं से पीड़ित परिवार की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है – वाहन मालिक के पास कोई दर्ज संपत्ति नहीं होती, वसूली की प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल होती है, जिला प्रशासन द्वारा वर्षों तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, पीड़ित परिवार को बार-बार अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और नतीजा यह होता है कि पीड़ित को वास्तविक राहत नहीं मिलती।

सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख बीमा कंपनियाँ जैसे न्यू इंडिया एश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, के साथ-साथ कई निजी बीमा कंपनियों के विरुद्ध भी हजारों मोटर दुर्घटना मुआवजा दावे लंबित पड़े हैं।

व्यवस्था की मूलभूत कमियाँ
प्रतिवेदन में यह स्पष्ट किया गया है कि आजः
देश-भर के एमएसीटी मामलों का कोई एकीकृत राष्ट्रीय डिजिटल डेटा नहीं
अपील और वसूली (एक्जीक्यूशन) की स्थिति पारदर्शी नहीं
अलग-अलग अदालतों में मुआवजे की गणना अलग-अलग
तकनीक और डिजिटल साधनों का अत्यंत सीमित उपयोग
यह स्थिति न्याय, समानता और मानवीय गरिमा-तीनों के विरुद्ध है।

क्या समाधान सुझाए गए हैं?
पुराने मामलों का तेज निपटाराः 2 और 5 साल से लंबित मामलों को प्राथमिकता, फास्ट-ट्रैक सुनवाई।
पूरी प्रक्रिया डिजिटल होः दुर्घटना से लेकर मुआवजा मिलने तक एक ही ऑनलाइन सिस्टम, पुलिस, बीमा, अदालत और वसूली विभाग आपस में जुड़े।
ऑनलाइन सुनवाई और ई-फाइलिंगः पीड़ितों को बार-बार अदालत न जाना पड़े, डॉक्टर, पुलिस और बीमा अधिकारी ऑनलाइन जुड़ सकें।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोगः केस का सार, दस्तावेजों की सूची, देरी की वजह-सब स्वचालित, जजों को तेज और सटीक निर्णय में सहायता।
मुआवजे की गणना एक-सी और सुप्रीम कोर्ट के फॉर्मूले के अनुसारः ताकि हर पीड़ित को समान और न्यायपूर्ण मुआवजा मिले व अनावश्यक अपीलों में कमी आए।
वसूली पर सख्त निगरानीः वाहन मालिक की संपत्ति का खुलासा, जिला प्रशासन को समय-सीमा में वसूली के निर्देश व देरी होने पर पीड़ित को अंतरिम राहत
यह केवल कानूनी नहीं, गहरा मानवीय संकट है

सड़क दुर्घटना के बाद परिवार पहले अपने प्रियजन को खोता है, फिर व्यवस्था की धीमी गति में उम्मीद भी खोने लगता है। अगर मुआवजा वर्षों बाद मिले, अगर आदेश के बाद भी पैसा न मिले, तो न्याय का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। अब समय आ गया है कि मोटर दुर्घटना मुआवजा व्यवस्था को केवल कानूनी प्रक्रिया न मानकर एक मानवीय दायित्व के रूप में देखा जाए, ताकि हर पीड़ित को समय पर, पूरा और वास्तविक मुआवजा मिल सके।

के.सी. जैन का बयानः

”दिनांक 27 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति को भेजे गए प्रतिवेदन का उद्देश्य केवल आँकड़े प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि लाखों पीड़ित परिवारों की पीड़ा को सामने लाना है। मोटर दुर्घटना का मुआवजा कोई दया नहीं, यह पीड़ितों का वैधानिक अधिकार है। यदि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट और मानवीय निर्देश दे दे तो ऐसी स्थिति में सड़क हादसों के पीड़ितों के लिये व्यवस्था तेज, पारदर्शी और प्रभावी बन सकती है और देश-भर में लाखों परिवारों को वास्तविक न्याय और राहत मिल सकेगी।”

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