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Varad Vinayaka (Durva) Chaturthi tomorrow#agranews

आगरालीक्स…वरद विनायक दूर्वा चतुर्थी कल है। भगवान गणेश का हुआ था अवतरण। इस दिन व्रत रखने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

व्रत रखने से दूर होते हैं कष्ट
वरद विनायक दूर्वा चतुर्थी गुरुवार के दिन पड़ रही है। भगवान श्री गणेश जी को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश जी का अवतरण हुआ था। इसी कारण चतुर्थी भगवान गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश समस्त संकटों का हरण करने वाले होते हैं। इनकी पूजा और व्रत करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

अलीगढ़ के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजनशर्मा ने बताया कि वरद विनायक (दूर्वा) श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। इस दिन दान करने का अधिक महत्व होता है। गणेश भगवान को तिल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। भगवान गणेश का स्थान सभी देवी-देवताओं में सर्वोपरि है। गणेश जी को सभी संकटों को दूर करने वाला तथा विघ्नहर्ता माना जाता है, जो भगवान गणेश की पूजा-अर्चना नियमित रूप से करते हैं, उनके घर में सुख व समृद्धि बढ़ती है।

पंडित हृदय रंजनशर्मा

गणेश जी से जुड़े पौराणिक तथ्य
किसी भी देव की आराधना के आरम्भ में किसी भी सत्कर्म व अनुष्ठान में, उत्तम-से-उत्तम और साधारण-से-साधारण कार्य में भी भगवान गणपति का स्मरण, उनका विधिवत पूजन किया जाता है। इनकी पूजा के बिना कोई भी मांगलिक कार्य को शुरु नहीं किया जाता है। यहां तक की किसी भी कार्यारम्भ के लिए ‘श्री गणेश’ एक मुहावरा बन गया है। शास्त्रों में इनकी पूजा सबसे पहले करने का स्पष्ट आदेश है।

ये हैं भगवान गणेश के नाम
श्री गणेश जी के बारह प्रसिद्ध नाम शास्त्रों में बताए गए हैं। सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्नविनाशन, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार
‘ॐ’ को साक्षात गणेश जी का स्वरुप माना गया है। जिस प्रकार प्रत्येक मंगल कार्य से पहले गणेश-पूजन होता है, उसी प्रकार प्रत्येक मन्त्र से पहले ‘ॐ’ लगाने से उस मन्त्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

गणेश दूर्वा चतुर्थी व्रत विधि
सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। उसके उपरान्त एक स्वच्छ आसन पर बैठकर भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान भगवान गणेश की धूप-दीप आदि से आराधना करनी चाहिए। विधिवत तरीके से भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। फल,फूल, अक्षत, रौली,मौली, पंचामृत से स्नान आदि कराने के पश्चात भगवान गणेश को घी से बनी वस्तुओं या लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए।

लाल वस्त्र धारण करें
इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को लाल वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा करते समय पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। विधिवत तरीके से भगवान गणेश की पूजा करने के बाद उसी समय गणेश जी के मंत्र ऊं गणेशाय नम: का 1008 बार जाप करना चाहिए।

ऐसे करें दान
इस दिन जो व्यक्ति भगवान गणेश का तिल चतुर्थी का व्रत रखते हैं और जो व्यक्ति व्रत नहीं रखते हैं, वह सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार गरीब लोगों को दान कर सकते हैं। इस दिन गरीब लोगों को गर्म वस्त्र, कम्बल, कपड़े आदि दान कर सकते हैं। भगवान गणेश को तिल तथा गुड़ के लड्डुओं का भोग लगाने के बाद प्रसाद को गरीब लोगों में बांटना चाहिए। लड्डुओं के अतिरिक्त अन्य खाद्य वस्तुओं को भी गरीब लोगों में बांटा जा सकता है।

वरद विनायक (दूर्वा) चतुर्थी व्रत कथा
गणेश चतुर्थी के संबंध में एक कथा जग प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती के मन में ख्याल आता है कि उनका कोई पुत्र नहीं है। ऐसे में वे अपने मैल से एक बालक की मूर्ति बनाकर उसमें जीव भरती हैं। इसके बाद वे कंदरा में स्थित कुंड में स्नान करने के लिए चली जाती हैं। परंतु जाने से पहले माता बालक को आदेश देती हैं कि किसी परिस्थिति में किसी को भी कंदरा में प्रवेश न करने देना। बालक अपनी माता के आदेश का पालन करने के लिए कंदरा के द्वार पर पहरा देने लगता है। कुछ समय बीत जाने के बाद वहां भगवान शिव पहुंचते हैं। शिव जैसे ही कंदरा के भीतर जाने के लिए आगे बढ़ते हैं, बालक उन्हें रोक देता है। शिव बालक को समझाने का प्रयास करते हैं लेकिन वह उनकी एक न सुना, जिससे क्रोधित हो कर भगवान शिव अपनी त्रिशूल से बालक का शीश धड़ से अलग कर देते हैं।


कथा में आगे


इस अनिष्ट घटना का आभास माता पार्वती को हो जाता है। वे स्नान कर कंदरा से बाहर आती हैं और देखती है कि उनका पुत्र धरती पर प्राण हीन पड़ा है और उसका शीश कटा है। यह दृश्य देख माता क्रोधित हो जाती हैं जिसे देख सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं। तब भगवान शिव गणों को आदेश देते हैं कि ऐसे बालक का शीश ले आओ जिसकी माता का पीठ उस बालक की ओर हो। गण एक हथनी के बालक का शीश लेकर आते हैं शिव गज के शीश को बाल के धड़ जोड़कर उसे जीवित करते हैं। इसके बाद माता पार्वती शिव से कहती हैं कि यह शीश गज का है जिसके कारण सब मेरे पुत्र का उपहास करेंगे। तब भगवान शिव बालक को वरदान देते हैं कि आज से संसार इन्हें गणपति के नाम से जानेगा। इसके साथ ही सभी देव भी उन्हें वरदान देते हैं कि कोई भी मांगलिक कार्य करने से पूर्व गणेश की पूजा करना अनिवार्य होगा। यदि ऐसा कोई नहीं करता है तो उसे उसके अनुष्ठान का फल नहीं मिलेगा।

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