आगरालीक्स…। बैकुंठ चतुर्दशी कल बुधवार को है। यह हरिहर के मिलन और उत्सव का दिवस है। सुख-शांति और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुंठ चौदस के नाम से जाना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजन शर्मा के मुताबिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु का मिलन होता है। इसलिए यह दिन शिव एवं विष्णु के उपासक बहुत धूमधाम और उत्साह से मनाते हैं। खासतौर पर उज्जैन, वाराणसी में बैकुंठ चतुर्दशी को बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। उज्जैन में भगवान महाकाल की सवारी धूमधाम से निकाली जाती और दीपावली की तरह आतिशबाजी की जाती है।
पौराणिक मान्यता
🍁 बैकुंठ चतुर्दशी के संबंध में हिंदू धर्म में मान्यता है कि संसार के समस्त मांगलिक कार्य भगवान विष्णु के सानिध्य में होते हैं, लेकिन चार महीने विष्णु के शयनकाल में सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। जब देव उठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं तो उसके बाद चतुर्दशी के दिन भगवान शिव उन्हें पुन: कार्यभार सौंपते हैं। इसीलिए यह दिन उत्सवी माहौल में मनाया जाता है।
कैसे मनाई जाती है चतुर्दशी
-इस दिन दोनों देवों की विशेष पूजा की जाती है। उज्जैन महाकाल में भव्य पैमाने पर बैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाती है। भगवान शिव का अभिषेक करने का बड़ा महत्व है।
- भगवान विष्णु की पूजा करके उनका भी श्रृंगार करना चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
-विष्णु मंदिरों में भी इस दिन दीपावली की तरह जश्न मनाया जाता है।
-इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके दान-पुण्य करना चाहिए। इससे समस्त पापों का प्रायश्चित होता है।
-नदियों में दीपदान करने से विष्णु-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
-बैकुंठ चतुर्दशी को व्रत कर तारों की छांव में तालाब, नदी के तट पर 14 दीपक जलाने चाहिए। वहीं बैठकर भगवान विष्णु को स्नान कराकर विधि विधान से पूजा अर्चना करें। उन्हें तुलसी पत्ते डालकर भोग लगाएं।
⭐ इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत करें। शास्त्रों की मान्यता है कि जो एक हजार कमल पुष्पों से भगवान श्री हरि विष्णु का पूजन कर शिव की पूजा अर्चना करते हैं, वे बंधनों से मुक्त होकर बैकुंठ धाम पाते हैं।
🌺 चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – 17 नवम्बर को सुबह 09:50 से।
🌺 चतुर्दशी तिथि समाप्त – 18 नवम्बर को दोपहर 12:00 तक।