आगरालीक्स..(Agra News 12th December). आगरा में डॉक्टरों ने कहा सरकार अपनी बात पर टिकी रहे नहीं तो हड़ताल पर जाएंगे डाक्टर, जानें क्या है कारण.
यूपी में नैदानिक स्थापनों का रजिस्ट्रीकरण The Clinical Establishment (Registration and regulations) Act 2010 सीईए एक जनवरी 2022 से लागू करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। जबकि यूपी सरकार 2018 में वादा कर चुकी थी कि हरियाणा की तर्ज पर यूपी में 50 बेड से अधिक क्षमता वाले अस्पतालों पर ही सीईए लागू होगा। इसके बाद भी छोटे अस्पताल और क्लीनिक जो मरीजों को सस्ता इलाज उनके नजदीक उपलब्ध करा रहे हैं उन पर भी सीईए लागू किया जाता है तो निजी चिकित्सक हड़ताल पर चले जाएंगे। रविवार को होटल होटल भावना क्लार्क इन में आयोजित प्रेसवार्ता में कहा कि सीईए को लागू नहीं होने दिया जाएगा।
एक्शन कमेटी के चेयरमैन डा. जेएन टंडन, सेल्सा आगरा के अध्यक्ष डा. सुनील शर्मा, डा. सुधीर धाकरे, डा. मनोज शर्मा, डा. संजय कुलश्रेष्ठ, डा. अनूप दीक्षित, डा. मुनीश्चर गुप्ता डा. शरद गुप्ता, डा. हरेंद्र गुप्ता, आइएमए आगरा के अध्यक्ष डा. राजीव उपाध्याय, अध्यक्ष निर्वाचित डॉ.ओपी यादव, आईएमए एटा के अध्यक्ष डा. आशुतोष गुप्ता, आइएमए इटावा के अध्यक्ष डा. अमिताभ श्रीवास्तव, सचिव डा. डीके सिंह, आइएमए, मैनपुरी के अध्यक्ष डा. आरएस यादव, आइएमए, फिरोजाबाद के अध्यक्ष डा. विनोद अग्रवाल, डा. जलज आदि मौजूदे रहे।

इसलिए किया जा रहा विरोध
१. क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट के लिए जो विदेशों की तर्ज पर मानक बनाए गए हैं वह छोटे और मध्यम वर्ग के सेट अप्स के लिए व्यवहारिक नहीं है, जिसकी वजह से छोटे या मध्यम नर्सिंग होम बन्द हो जाएंगे, केवल कुछ बड़े कार्पोरेट हास्पीटल ही वह मानक पूरे कर पाएंगे। अतः गरीब, ग्रामीण व मध्यम वर्ग के लोगों के लिए सस्ता इलाज दुर्लभ हो जाएगा और उन्हें मजबूरन बड़े अस्पतालों में मंहगा इलाज कराना होगा जो शायद उनके लिए सम्भव ही न हो।
आज ७० प्रतिशत से अधिक ऐसे लोग कम खर्चे में छोटे नर्सिंग होम में इलाज कराते हैं, जबकि वह भी उनकी जेब पर भारी पड़ता है।
भारत एक विकासशील देश है जहाँ प्राइवेट सेक्टर में चिकित्सा सेवाओं में अनेक विविधता है जहाँ समाज के सब वर्ग अपनी वित्तीय क्षमता के अनुसार इलाज़ की सुविधा चुन लेते हैं ! चिकित्सा सेवा दैनिक जीवन की एक बहुत अहम् ज़रूरत या एक मज़बूरी है जिसको समाज के गरीब से गरीब वर्ग तो भी मुहैया करवाना हम सभी डाक्टरों की जिम्मेदारी है! लेकिन यदि सीईए के कठिन मानकों को लागू कर दिया गया तो गरीब व् मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा वित्तीय बोझ पड़ेगा!
२. जिला स्तरीय सीईए कमेटी में डीएम को चेयरमैन बनाया गया है जबकि आई एम ए के अनुसार सीएमओ को इस कमैटी का हैड होना चाहिए।
३. इस एक्ट के अनुसार सभी क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट पर बाध्यता है कि किसी भी प्रकार की इमरजेंसी को स्टेबलाइज कर के आगे उच्च स्तरीय अस्पताल में स्थानांतरित करने तक की जिम्मेदारी चिकित्सक की होगी। जो कि व्यवहारिक ही नहीं बल्कि मरीज के हित में नहीं है क्योंकि जैसे कि एक हड्डी रोग या नेत्र रोग विशेषज्ञ के सेट अप पर हार्ट अटैक का मरीज आता है तो न तो वह इस प्रकार के मरीज को स्टेबलाइज करने में उसे सक्षम है और न ही उसके पास उस प्रकार के उपकरण होंगे। वह उसे फर्स्ट एड तो दे सकता है परन्तु स्टेबलाइज नहीं।
४. स्टेंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल: हर बीमारी का एक स्टेंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल बनाया गया है। मसलन प्रत्येक डाक्टर को किसी उपरोक्त बीमारी का इलाज उसी स्टेंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल के अनुसार करना है। अन्यथा वह कानून के खिलाफ जाएगा। चिकित्सा एक एसी विधी है जो केवल किताबी ज्ञान पर आधारित नहीं है, अनुभव पर भी आधारित है और प्रयोगों पर भी। हर चिकित्सक का ज्ञान, अनुभव एवं सोच एक जैसी नहीं हो सकती। चिकित्सक कोई रोबोट नहीं है जो अपने दिमाग से कार्य न करके एक तयशुदा प्रोटोकॉल के अनुसार इलाज करे।
५. क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट के लिए मानक शहर, कस्बों, ग्रामीण इलाकों के लिए अलग होने चाहिए। इन विदेशी स्टाइल के मानकों से जो लागत आएगी उसका सीधा असर मरीजों की जेब पर पड़ेगा।
६. इस कानून के तहत कोर्ट में कोई अपील का मौका नहीं दिया गया है, जो लोकतंत्र के खिलाफ है।
७. सरकारी व प्राइवेट के मानक अलग होने चाहिए क्योंकि सरकारी सेट उप में इंफ्रास्ट्रक्चर व सर्विसेज में काफी बजट व ह्यूमन रिसोर्स में सरकारी मदद मिलती है।
८. इस एक्ट के वर्तमान प्रारूप को जल्दबाज़ी में लागू करने से प्रदेश भर में करीब एक लाख से ज्यादा एलोपैथिक /आयुर्वेदिक / डेंटिस्ट / अन्य पैथी के चिकित्सक व उo प्रo के छोटे एवं मझोले (करीब 50 हजार ) से ज्यादा अस्पताल संकट में आ जायेंगे क्योंकि इसमें दिए गए इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर के मानक पूरे ही नहीं पाएंगे। जिसका सीधा असर ग्रामीण एवं छोटे शहरों की जनता पर पड़ेगा।