आगरालीक्स…आगरा की रामबारात का इतिहास इस खबर में पढ़ें. जानें पहली बार कब हुआ था मंचन. बेलगाड़ी और फिर हाथी पर सवार होकर निकलते थे रामजी. देखें रामबारात के सबसे पुराने फोटोज
देवता और मनुष्य मंगलायन कर रहे हैं रसीले राग से शहनाई बज रही हैं रामबरात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बन रहा। सभी दिशाओं में सुंदर में सुंदर और शुभदायक शगुन हो रहे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम को दूल्हे के रूप में देख देव सुन्दरियां भी घरों की छतों से फूल बरसाकर गीत गा रही हैं देवता तक नगाड़े बजा रहे हैं। घोड़े और हाथी गरज रहे हैं। बारात में बैंड-बाजे बज रहे हैं। पशु पक्षी नर नारी देव सब सिया को ब्याहने आ रहे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को निहार रहे हैं। उधर, जनकपुरी में रामबरात की अगवानी की तैयारी चल रही हैं। सतरंगी रोशनी से नहाए जनक महल की शोभा देखते ही बनती है। पुराने शहर रावतपाड़ा के व्यापारियों ने रामलीला और रामबरात की परिकल्पना की। वर्ष 1885, लाला चन्नौमहल की बारहदरी, श्री मनकामेश्वर मंदिर गली में पहली बार रामलीला का मंचन हुआ। बेलगाड़ी पर रामबरात निकली। इसके बाद भारत पाकिस्तान युद्ध और कोरोना काल के दो साल में रामबरात नहीं निकली, दो साल बाद रामलीला का मंचन हो रहा है, 21 सितंबर को राम बरात निकलेगी। 21 से 23 सितंबर को दयालबाग में जनकपुरी का आयोजन किया जाएगा। आठ अक्टूबर को समापन होगा।

बारहदरी से निकलकर मंचन रामलीला मैदान तक पहुंचा
रामलीला महोत्सव की लोकप्रियता बढ़ी, इससे लाला चन्नौमहल की बारहदरी निकलकर रामलीला रावतपाड़ा चौराहा (बारह टोंटी चौराहा) पर पहुंच गई। 1930 में छावनी परिषद से रामलीला मैदान को श्री रामलीला कमेटी ने लिया और रामलीला के लिए मंच तैयार कराए गए। इसके बाद से रामलीला का मंचन रामलीला मैदान में शुरू हो गया।
स्थानीय लोग की बनते थे पात्र, अब बुलाई जाती है मंडली
रामलीला मंचन के लिए रावतपाड़ा, बेलनगंज, यमुना ब्रिज सहित पुराने शहर के ब्राह्मण समाज के लोग रामलीला मंचन के लिए पात्र बनते थे, एक एक व्यक्ति कई पात्र के रूप में मंचन करता था। रामलीला महोत्सव और रामबरात को भव्यता देने के लिए मंडली को बुलाया जाने लगा। कई सालों से मथुरा से रामलीला मंचन के लिए मंडली बुलाई जाती है। मंडली में राम, सीता, लक्ष्मण, शत्रुध्न सहित अन्य पात्र मंडली के कलाकार निभाते हैं।

हंडा की रोशनी, बेलगाड़ी भरतपुर नरेश के हाथी और अब रथ पर निकलती है रामबरात
पहले रामबरात हंडां की रोशनी में बेलगाड़ी पर निकलती थी, स्वर्गीय लाला चन्नौमल की बारहदरी मनकामेश्वर मंदिर से प्रारंभ होकर रावतपड़ा, अग्रसेन मार्गए सुभाष बाजार, दरेसी नंबर एक व दो, छत्ता बाजार, बेलनगंज, पथवारी, धुलियागंज, सेब का बाजार, बिनारी बाजार, कसरेट बाजार, रावतपाड़ा होते हुए स्वर्गीय लाला चन्नौमल की बारहदरी पर रामबरात का समापन होता था। इसके बाद हाथी पर रामबरात निकलने लगी, भरतपुर नरेश के हाथी आते थे, इन हाथियों पर प्रभु श्रीराम के साथ चारों भाई बैठकर निकलते थे। 2010 11 में हाथियों के राम बरात में शामिल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, इसके बाद रथ पर सवारी निकलेने लगी। रत्न जड़ित रथों पर प्रभु श्रीराम निकलते हैं और 15 बैंड शामिल होते हैं। रामबरात में 100 से अधिक झांकियां शामिल होती हैं।

1973 में बनवाया चांदी का रथ, विष्णु की सवारी
श्रीरामलीला कमेटी द्वारा 1973 74 में चांदी का रथ बनवाया गया। इस रथ पर भगवान विष्णु की सवारी निकलती है, बेशकीमती रथ को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटती है।
दूर दूर से आते थे रामबरात देखते, छतों पर बैठकर रात भर जागते थे
रामबरात देखने के लिए दूर दराज से लोग आते थे, रातबरात के मार्ग पर रात में छतों पर बैठकर प्रभु श्रीराम की सवारी का इंतजार करते थे, इंतजार करते करते सुबह हो जाती थी।
सिनेमा घरों में चलते थे छह शो
रामबरात और उसके बाद दो तीन दिन तक शहर के सिनेमा घरों में चार की जगह छह शो चलते थे। लोग रामबरात देखने के बाद फिल्म देखने चलते जाते थे। 24 घंटे सिनेमाघरों में लोगों की भीड़ रहती थी।