आगरालीक्स… बचपन में शौक था पिताजी जैसा बनने का, जवानी में एहसास हुआ कि ईश्वर की बराबरी नहीं होती, वे एक अच्छे सर्जन ही नहीं, सेवा, समर्पण और मानवीय संवेदनाओं की मिसाल थे। फादर्स डे पर स्व. डॉ. अजय प्रकाश को डॉ. श्वेतांक प्रकाश, डॉ. ब्लोसम प्रकाश, डॉ. स्वाति प्रकाश, सारा प्रकाश, भावभीनी श्रद्धांजलि
बचपन में जब भी पिता डॉ. अजय प्रकाश को सफेद कोट पहनकर अस्पताल जाते देखता था, तो मन में एक ही ख्वाहिश उठती थी मुझे भी बिल्कुल पिताजी जैसा बनना है।” उस समय लगता था कि उनसे बड़ा, उनसे अधिक सक्षम और उनसे अधिक सम्मानित कोई नहीं हो सकता। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, जिम्मेदारियां समझ में आईं, जीवन के संघर्षों का सामना हुआ, तब एहसास हुआ कि पिता जैसा बनना तो दूर, उनकी ऊंचाइयों तक पहुंचना भी आसान नहीं। तब समझ आया कि कुछ लोग केवल पिता नहीं होते, वे अपने परिवार के लिए ईश्वर का स्वरूप होते हैं। फादर्स डे के अवसर पर स्वर्गीय डॉ. अजय प्रकाश को याद करते हुए उनका परिवार, उनके सहयोगी और हजारों मरीज भावुक हो उठते हैं। चिकित्सा जगत में उनका नाम केवल एक सफल सर्जन के रूप में नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और मानवीय संवेदनाओं की मिसाल के रूप में लिया जाता है।

फाइजर गोल्ड मेडल से किए गए सम्मानित
डॉ. अजय प्रकाश का जीवन संघर्ष, प्रतिभा और उपलब्धियों की एक अद्भुत यात्रा रहा। वर्ष 1967 में उन्होंने हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी और अंग्रेजी तथा गणित में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की तथा उत्तर प्रदेश बोर्ड में 71वीं रैंक प्राप्त की। इसके बाद इंटरमीडिएट में रसायन विज्ञान में ऑनर्स के साथ प्रथम श्रेणी हासिल की। मेडिकल शिक्षा के दौरान उन्होंने एक के बाद एक ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
एमबीबीएस के छात्र जीवन में उन्हें अनेक स्वर्ण पदक, रजत पदक और सम्मान प्राप्त हुए। वे उन चुनिंदा विद्यार्थियों में शामिल रहे जिन्हें विश्वविद्यालय स्तर पर सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ। चिकित्सा के विभिन्न विषयों में प्रथम स्थान प्राप्त करना उनकी आदत बन चुकी थी। उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फाइजर गोल्ड मेडल सहित अनेक राष्ट्रीय और संस्थागत सम्मान मिले। लेकिन उनकी महानता केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं थी।
विदेश नहीं गए, आगरा में यूपी का पहला अल्टासोनोग्राफी सेंटर खोला
वर्ष 1981 में अमेरिका की प्रतिष्ठित मेडिकल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी उन्होंने विदेश में बसने के बजाय भारत में रहकर अपने देशवासियों की सेवा करने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके राष्ट्रप्रेम और सेवा भावना का प्रतीक था। चिकित्सा क्षेत्र में उन्होंने कई ऐतिहासिक पहल कीं। उत्तर प्रदेश का पहला अल्ट्रासोनोग्राफी सेंटर स्थापित करना हो, उत्तर भारत के निजी क्षेत्र में पहली बार पीसीएनएल तकनीक शुरू करना हो, या फिर किडनी स्टोन के लिए आधुनिक आरआईआरएस तकनीक को अपनाना—हर बार वे समय से आगे सोचने वाले चिकित्सक साबित हुए।
2.5 सेंटीमीटर के एक छोटे से छिद्र से पित्ताशय की सर्जरी, 16 घंटे में किए 62 आपरेशन
वर्ष 1990 में उन्होंने मात्र 2.5 सेंटीमीटर के एक छोटे से छिद्र से पित्ताशय (गॉलब्लैडर) की सर्जरी कर चिकित्सा जगत को नई दिशा दी। इसके अगले ही वर्ष उन्होंने सिंगल-होल अपेंडिक्स सर्जरी की शुरुआत की। उस दौर में जब ऐसी तकनीकें केवल कल्पना मानी जाती थीं, तब डॉ. अजय प्रकाश उन्हें वास्तविकता में बदल रहे थे।उनकी कार्यक्षमता और समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2003 में उन्होंने केवल 16 घंटे में 62 सफल सर्जरी कर एक असाधारण उपलब्धि हासिल की। इस उपलब्धि पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने स्वयं उन्हें फोन कर बधाई और आशीर्वाद दिया। वर्ष 2006 में 23 घंटे के भीतर 85 मरीजों की सफल सर्जरी कर उन्होंने एक और अद्भुत रिकॉर्ड स्थापित किया।
अत्याधुनिक शांतिवेद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज शुरू किया
चिकित्सा सेवा के साथ-साथ सामाजिक सरोकार भी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से अनेक निःशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित किए गए, जिनसे हजारों जरूरतमंद मरीजों को लाभ मिला। उनकी मान्यता थी कि चिकित्सा केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का सबसे बड़ा माध्यम है।वर्ष 2019 में आगरा में स्थापित विश्वस्तरीय सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल शांतिवेद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SVIMS) की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। आज यह संस्थान हजारों मरीजों को अत्याधुनिक चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर रहा है और उनके सपनों को आगे बढ़ा रहा है।फादर्स डे पर उनके पुत्र डॉ. श्वेतांक प्रकाश और परिवार के सदस्य जब उन्हें याद करते हैं, तो आंखें नम हो जाती हैं।
उनके लिए डॉ. अजय प्रकाश केवल पिता नहीं थे, बल्कि एक मार्गदर्शक, प्रेरणा और जीवन का आधार थे।उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए परिवार की भावनाएं कुछ यूं व्यक्त होती हैं—
“बचपन में शौक था पिताजी जैसा बनने का। लगता था कि उनसे बेहतर कोई नहीं। लेकिन जवानी में समझ आया कि कुछ लोगों की बराबरी नहीं की जा सकती। तब एहसास हुआ कि पिता की तुलना किसी इंसान से नहीं, केवल ईश्वर से की जा सकती है। आज भले ही डॉ. अजय प्रकाश हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श, उनकी शिक्षाएं और उनकी सेवा भावना हजारों लोगों के जीवन में हमेशा जीवित रहेंगी। यही किसी महान पिता और महान इंसान की सबसे बड़ी पहचान होती है।
फादर्स डे पर स्व. डॉ. अजय प्रकाश को विनम्र श्रद्धांजलि।