आगरालीक्स…Agra News: युवाओं की स्पर्म की क्वालिटी के साथ ही डीएनए भी डैमेज हो रहा है, यह है कारण, आगरा में शुरू हुई आईवीएफ व बांझपन विशेषज्ञों की इंटरनेशनल कांग्रेस आफ एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलाजिस्ट, इंडिया की कार्यशाला में पहले दिन नई तकनीकी पर चर्चा की गई।
आगरा के होटल आईटीसी मुगल में आयोजित कार्यशाला में आयोजन समिति के सचिव डॉ. केशव मल्होत्रा ने बताया कि वर्तमान समय में युवाओं में स्पर्म काउंट में कमी के साथ-साथ उनके डीएनए डैमेज (Sperm DNA Fragmentation) के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। कहा कि इसका सीधा असर न केवल गर्भधारण की संभावना पर पड़ता है, बल्कि भविष्य में जन्म लेने वाले शिशु के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाल सकता है। आईवीएफ तकनीक के माध्यम से संतान प्राप्ति संभव हो रही है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि जन्म लेने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ हो। इसी दिशा में अब चिकित्सा क्षेत्र में एआई आधारित आधुनिक डिवाइस और मशीनें विकसित हो चुकी हैं, जो बेहतर गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं के चयन में मदद करती हैं। इन तकनीकों से एम्ब्रियोलॉजिस्ट को उच्च गुणवत्ता के स्पर्म चुनने में आसानी होती है, जिससे स्वस्थ भ्रूण और स्वस्थ शिशु की संभावना बढ़ जाती है।
फास्ट फूड से बढ़ रही बांझपन की समस्या
आयोजन समिति की अध्यक्ष डॉ. सुजाता रामाकृष्णनन, व डॉ. गौरव मजूमदार ने बताया कि पर्यावरण प्रदूषण, जंक फूड का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और तनावपूर्ण जीवनशैली पुरुष प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। देर रात तक जागना, अनियमित दिनचर्या और नशे की आदतें इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा ने युवाओं को जीवनशैली में सुधार लाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जल्दी सोना और जल्दी उठना, स्वस्थ दिनचर्या अपनाना और नशे से पूरी तरह दूर रहना बेहद जरूरी है। स्पष्ट किया कि खानपान में स्वाद से अधिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। अधिक स्मोकिंग, अत्यधिक चॉकलेट का सेवन और किसी भी प्रकार का नशा बांझपन की समस्या को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और सकारात्मक दिनचर्या अपनाकर वे अपनी प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाए रख सकते हैं। इन आदतों में सुधार किया जाए तो बांझपन की बढ़ती समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
आईवीएफ क्लीनिक की तुलना में 40 फीसदी एम्ब्रियोलॉजिस्ट
बांझपन (इन्फर्टिलिटी) की समस्या के बीच प्रशिक्षित भ्रूण वैज्ञानिकों (एम्ब्रियोलॉजिस्ट) की कमी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अनुमान है कि देश में लगभग 15 प्रतिशत लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। जिसके कारण आईवीएफ क्लीनिकों की संख्या तेजी से बढ़कर करीब 6 हजार तक पहुंच चुकी है। लेकिन इसके मुकाबले लगभग 2500 हजार भ्रूण वैज्ञानिक ही उपलब्ध हैं। ऐसे में कौशल आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस दौरान डॉ. जयदीप मल्होत्रा, डॉ. जयदीप मल्होत्रा, डॉ. निहारिका मल्होत्रा, एसीई के अध्यक्ष सुजाता रामकृष्णन, इनकमिंग प्रसीडेंट, गौरव मजूमदार, सचिव डॉ.परुषराम गोपीनाथ, डॉ. रीता वासेना डॉ. अनुपम गुप्ता, अम्बर गुप्ता, किया पाराशर, रजनी पचौरी, मीनल जैन, डॉ. सुधा बंसल, रिचा सिंह, डॉ. नीरजा सचदेव, डॉ. कृष्णा चैतन्य आदि उपस्थित थीं
कल होगा कार्यशाला का शुभारंभ
अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के दूसरे दिन, 8 अगस्त को कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन केंद्रीय राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल द्वारा किया जाएगा। इस अवसर पर देश-विदेश से आए एक हजार से अधिक विशेषज्ञ, चिकित्सक और शोधकर्ता मौजूद रहेंगे। उद्घाटन सत्र के साथ ही कार्यक्रम में वैज्ञानिक आदान-प्रदान की औपचारिक शुरुआत होगी।
उद्घाटन के बाद पूरे दिन विभिन्न साइंटिफिक सेशन आयोजित किए जाएंगे, जिनमें प्रजनन चिकित्सा, आईवीएफ तकनीक और एम्ब्रियोलॉजी से जुड़े नवीनतम शोध और तकनीकों पर चर्चा होगी। इन सत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ अपने अनुभव साझा करेंगे और आधुनिक लैब तकनीकों, भ्रूण विकास, स्पर्म चयन और उपचार की नई पद्धतियों पर प्रकाश डालेंगे